मुश्किल हालात नहीं, हमारा नज़रिया होता है. ये नज़रिया ही है, जिससे किसी को मंज़िल की ख़ूबसूरती नज़र आती है, तो किसी को रास्ते की दुश्वारियां. फ़ैसला आपका है, आप कौन सा नज़रिया अपनाते हैं. क्योंकि जो लोग पथरीली राहों पर चट्टानी हौंसलों के साथ आगे बढ़ते हैं, उनके क़दम मंज़िले भी चूमकर झूम उठती हैं.

आज की कहानी ऐसे ही लोगों के बारे में है, जिन्होंने मुश्किल हालात को बुलंद हौंसलों से मात दी और IAS-IPS जैसे अफ़सर बनकर आज युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं.

1. पिता ऊंट-गाड़ी खींचते थे और बेटा अपने दम पर बना IPS अफ़सर 

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गुजरात कैडर के आईपीएस प्रेम सुख डेलू, राजस्थान के बीकानेर जिले के रहने वाले हैं. एक किसान परिवार से आने वाले प्रेम के पिता के पास ज़्यादा ज़मीन नहीं थी, इसलिए वो ऊंटगाड़ी चला कर लोगों का सामान एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का काम करते थे. बहुत कम उम्र में ही प्रेम समझ गए थे कि शिक्षा ही उनके परिवार को ग़रीबी के इस दलदल से बाहर निकाल सकती है. हालांकि, उस वक़्त प्रेम के दिमाग़ में सिर्फ़ एक सरकारी नौकरी ही थी. ऐसे में उन्होंने पटवारी का एग्ज़ाम दिया और सफ़ल भी हो गए.

प्रेम और दूसरे लोगों में यही फ़र्क था. जहां लोग एक नौकरी मिलने का बाद संतुष्ट हो जाते. वहीं, प्रेम ने आगे बढ़ते रहने का फ़ैसला किया. उन्होंने बाद में राजस्थान में ग्राम सेवक के पद हेतु निकली परीक्षा में दूसरी रैंक प्राप्त की. फिर सब इंस्पेक्टर, असिस्टेंट जेलर जैसे पदों पर भी उनका चयन हो गया. यहां तक एक कॉलेज में उनका लेक्चरर पद पर भी चयन हो गया. लेकिन अब बारी थी, उनकी ज़िंदगी के सबसे सपने के पूरे होने की. वो दिन भी आ गया. साल 2015 में प्रेम की लगन और मेहनत रंग लाई और उन्होंने दूसरे प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा क्लियर कर ली. उनकी ऑल इंडिया 170वां रैंक आई थी.

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2. ग़रीबी की जंजीरें और पोलियो भी नहीं रोक पाया सफ़लता की राह पर दौड़ने से

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रमेश घोलप, महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वारसी तहसील के महागांव में पैदा हुए थे. पिता साइकिल रिपेयरिंग की दुकान चलाते थे. शराब की बुरी लत के आगे उन्हें अपना परिवार भी नहीं दिखता था. दो वक़्त की रोटी भी परिवार को बमुश्किल नसीब थी, उस पर डेढ़ साल की उम्र में रमेश का बांया पैर पोलियों की चपेट में आ गया. घर का खर्च निकालने के लिए रमेश की मां गांव-गांव जाकर चूड़ियां बेचती थीं. रमेश भी इस काम में अपनी मां का हाथ बंटाते थे. 

इस दौरान कुछ अच्छा था, तो ये कि रमेश को पढ़ने का शौक था. वो गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे. आगे की पढ़ाई के लिए रमेश अपने चाचा के घर चले गए. रमेश ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और वो 2009 में एक अध्यापक बन चुके थे. आगे वो यूपीएएससी की तैयारी के लिए पुणे चले गए. रमेश को कुछ बड़ा हासिल करने का ऐसा जुनून था कि उन्होंने अपनी पुरानी नौकरी छोड़कर तैयारी शुरू कर दी. रमेश अपने खर्चों को पूरा करने के लिए पोस्टर तक पेंट करते थे. हालांकि, रमेश की ये सारी मेहनत ज़ाया नहीं गई. साल 2011 में उनका सेलेक्शन आईएएस में हो गया. एक लड़का जिसने कभी अपनी मां के साथ चूड़ियां बेची थीं, जो कभी पोस्टर पेंट करता था आज वो आईएएस ऑफिसर रमेश गोरख घोलप बन चुका था.

3. मां शराब बेचती थी और बेटा बन गया IAS

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महाराष्ट्र के धुले ज़िले के रहने वाले राजेंद्र भारूड जब अपनी मां के पेट में थे तब उनके पिता का निधन हो गया था. मां के ऊपर तीन बच्चों को पालने और उन्हें पढ़ाने की ज़िम्मेदारी थी. ऐसे में उन्होंने शराब बेचना शुरू किया. राजेंद्र जब थोड़े बड़े हुए तो शराब पीने आने वाले लोग कोई न कोई काम करने को कहते. स्नैक्स वगैरह मंगाते. उसके बदले उन्हें कुछ पैसे देते. 

राजेंद्र इन्हीं पैसों से किताबें ख़रीदते और पढ़ाई करते थे. 10वीं, 12वीं में अच्छे नंबरों से पास होने के बाद उन्होंने 2006 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा भी पास कर ली. शराबियों के लिए स्नैक्स लाने वाला लड़का अब डॉ. राजेंद्र भारूड बन चुका था. हालांकि, राजेंद्र ने अब अपना लक्ष्य यूपीएससी को बना लिया. ख़ुद की मेहनत के दम पर उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली और बाद में कलेक्टर भी बन गए. राजेंद्र भारूड 2013 के बैच के आईएएस ऑफ़िसर हैं. जो लोग कहते थे कि शराब बेचने वाले का बेटा शराब ही बेचेगा, उनको राजेंद्र ने मुंहतोड़ जवाब दे दिया था.

4. लकड़ी काटने वाला मज़दूर बना IAS 

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तमिलनाडु के तंजावुर जिले के रहने वाले एम शिवागुरू प्रभाकरन के परिवार के हालात बेहद ख़राब थे. उनके पिता को शराब की लत थी. मां और बहन टोकिरयां बुनकर घर का खर्चा चलाती थीं. प्रभाकरन का सपना इंजीनियर बनने का था, लेकिन परिवार की स्थिति के कारण उन्हें 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. उसके बाद वो एक आरा मशीन में लकड़ी काटने का काम करने लगे. हालांकि, इस दौरान भी उन्होंने अपने सपने को मरने नहीं दिया. काम के बाद भी वो स्टेशन पर जाकर पढ़ाई करते थे. 

इसी दौरान उनके दोस्त ने उन्हें सेंट थॉमस माउंट के बारे में बताया, जो कि पिछड़े लोगों के लिए ट्रेनिंग की सुविधा देता है. यहां ट्रेनिंग करने के बाद प्रभाकरन की ज़िंदगी संवर गई. उनका दाखिला आईआईटी में हो गया. इसके बाद उन्होंने एमटेक भी किया, जिसमें टॉप रैंक हासिल की. हालांकि, प्रभाकरन इससे भी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा दी. तीन बार की असफ़लता के बाद प्रभाकरन ने 2017 में अपने चौथे प्रयास में यूपीएससी एग्ज़ाम में 101वीं रैंक हासिल की. 

5. केरल की पहली आदिवासी लड़की जो बनी IAS 

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केरल के वायनाड की रहने वाली श्रीधन्या सुरेश पहली ट्राइबल लड़की हैं, जिसने IAS की परीक्षा क्लियर की थी. उन्होंने अपने तीसरे प्रयास में 2019 में यूपीएससी में 410वीं रैंक हासिल की. हालांकि, उनका ये सफ़र आसान नहीं था. श्रीधन्या के पिता मनरेगा में मजदूरी करते थे और बाकी समय धनुष-तीर बेचा करते थे. उन्हें सरकार की ओर से थोड़ी ज़मीन मिली थी, लेकिन पैसे की तंगी के चलते वो उसे पूरा बनवा नहीं सके. इसी घर में श्रीधन्या अपने माता-पिता, और दो भाई-बहनों के साथ रहती आ रही थीं.

पोज़ुथाना गांव के कुरिचिया जनजाति से आने वाली श्रीधन्या के परिवार के पास भले ही पैसे नहीं थे, फिर भी उनको आगे पढ़ाया गया. कोझीकोड के सेंट जोसफ कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन करने के बाद इसी कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया. बाद में वो केरल अनुसूचित जनजाति विकास विभाग में क्लर्क के तौर पर काम करने लगीं. उसके बाद वायनाड के एक आदिवासी हॉस्टल में वार्डन के तौर पर काम किया. यहां रहते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी है. बता दें, जब श्रीधन्या ने यूपीएससी का मेन्स किल्यर किया, तो उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वो दिल्ली जाकर इंटरव्यू दे सकें. ऐसे में उनके दोस्तों ने मिलकर 40,000 रुपये इकठ्ठा किए. तब जाकर वो दिल्ली आ पाईं.

6. अनाथालाय में पढ़ा बच्चा बन गया IAS

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केरल के रहने वाले बी अब्दुल नसार छह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. पिता के देहांत के बाद उनकी मां सभी बच्चों की परवरिश नहीं कर सकती थीं, इसलिए 5 साल की उम्र में उन्होंने अब्दुल को अनाथालाय में छोड़ दिया. यहीं वो प्राइमरी स्कूल में पढ़ाई करने लगे. बाद में नसार ने इंग्लिश लिटरेचर से ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया. जिसके बाद उनका सेलेक्शन हेल्थ इंस्पेक्टर के पद पर हो गया. हालांकि, तब तक उन्होंने मन ही मन आईएएस बनने की ठान ली थी. 

साल 1994 में जब केरल पब्लिक कमीशन ने डिप्टी कलेक्टर पोस्ट के लिए नोटिफिकेशन जारी किया तो नसार ने इसे देने का निर्णय लिया. दरअसल, नसार इस बात से वाकिफ़ थे कि एक बार डिप्टी कलेक्टर के तौर पर सीधे भर्ती के बाद वो प्रमोशन पाकर आईएएस बन सकते हैं. साल 2006 में कई बार कोशिश करने के बाद आखिरकार वो डिप्टी कलेक्टर के तौर पर सिलेक्ट हुए. फिर साल 2017 में वो दिन भी आ गया, जब उनका बरसों पुराना सपना पूरा गया. नसार को आईएएस अफसर के तौर पर प्रमोट कर दिया गया. 



ऐसी बहुत सी कहानियां हैं, जो बताती हैं कि सफ़लता संसाधनों की मोहताज नहीं होती. सच्ची लगन और मेहनत से हर ऊंचा मुकाम हासिल किया जा सकता है.