इस चुनाव में बड़े सूरमाओं को हार का मुंह देखना पड़ा, अमेठी से राहुल गांधी हार गए, भोपाल से दिग्विजय सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा, कुल सात पूर्व मुख्यमंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. इस लिस्ट में एक नाम और है जो चौंकाता है.

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मध्यप्रदेश की गुना-शिवपुरी सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार सबको हैरान कर गई. इससे भी ज़्यादा उस शख़्स को हैरानी हुई होगी जिसके हिस्से जीत गई है. डॉ. के. पी. यादव, पूरा नाम कृष्ण पाल सिंह यादव.

कौन है के. पी. यादव?

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चुनाव परिणाम के आने के बाद से सोशल मीडिया पर एक तस्वीर बहुत वायरल हो रही है. तस्वीर में ज्योतिरादित्य सिंधिया गाड़ी के भीतर बैठे हैं और गाड़ी के बाहर फ़ैन की तरह एक अज्ञात इंसान सेल्फ़ी ले रहा है. वो सेल्फ़ी लेता इंसान ही के. पी. यादव है, जिसने गाड़ी के भीतर बैठे सिंधिया राजघराने के वारिस को 1 लाख 25 हज़ार और 549 वोटों से हराया है.

के. पी. यादव एक साल पहले तक ज्योतिरादित्य के लिए काम किया करते थे, उनका परिवार पुराना कांग्रेस समर्थक रहा है. उनके पिता रघुवीर सिंह यादव चार बार गुना ज़िला पंचायत के अध्यक्ष रहे थे.

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साल 2004 में के. पी. यादव ने भी राजनीति में कदम रखा. सिंधिया के करीब पहुंचते-पहुचते उनेक सांसद प्रतिनिधि भी बन गए. अब मन में बड़ी कुर्सी की इच्छा थी. मुंगावली विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव होने थे, के. पी. यादव ख़ुद को कांग्रेस की ओर से उम्मीदावर मान बैठे थे लेकिन अंतिम मौके पर बृजेंद्र सिंह यादव को टिकट मिला. नाराज़ के. पी. यादव कांग्रेस का हाथ छोड़ भाजपा के काफ़ीले में पहुंच गए.

भाजपा ने लगे हाथ मुंगावली से के. पी. यादव को मौका दे दिया लेकिन मुंगावली में सफ़लता हाथ नहीं लगी. भाजपा ने एक बड़ी लड़ाई में दोबारा मौका दिया. भाजपा के भीतर भी इस फ़ैसले की आलोचना हो रही थी. एक पुराना कांग्रेसी और विधानसभा की लड़ाई हार चुका व्यक्ति ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने टिकेगा, इस बात पर लोगों को शक था. फिर 23 मई को जो हुआ वो दुनिया का सामने है.

गुना जीतने के मायने क्या हैं?

इस सीट पर सदियों से सिंधिया राजघराने का वर्चस्व था. मुख्य चुनाव और उपचुनाव की गिनती करें, तो कुल 20 बार इस सीट पर सिंधिया परिवार से जुड़े व्यक्ति को जीत मिली है. दादी विजयराजे सिंधिया 6 बार, पिता माधवराव सिंधिया 4 बार और ख़ुद ज्योतिरादित्य सिंधिया 4 बार यहां से चुनाव जीत चुके थे. बीच में एक बार राजघराने के ख़ास महेंद्र सिंह कालूखेड़ा भी इस सीट पर विजेता रह चुके थे.

गुना की जनता ने राजघराने के चिराग ज्योतिरादित्य को पांचवा मौका नहीं दिया और वो 41 फ़ीसदी मत पा सके और सालभर पुराने भाजपा नेता के. पी. यादव को मिला 52 प्रतिशत मत.