लोग अक़्सर सरकार की आलोचना करते मिल जाते हैं. सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया. सत्ताधारी उनकी सुनते नहीं है, मदद नहीं करते. लेकिन राजनेताओं और सरकार ने कब किसी के लिए कुछ किया है. करती भी है तो महज़ इसलिए कि उन्हें लोग कम वोट ज़्यादा दिखते हैं. हम हमेशा से चंद नेताओं को सड़क से उठाकर सिर पर बैठाते रहे हैं, और वो सड़क का नेता सिर चढ़ते ही राजनेता बन जाता है. नतीजा, हमारा सिर हमेशा उनके बोझ से झुका ही रहता है. 

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लेकिन वो कहते हैं न जब बोझ ज़्यादा हो जाए तो उसे उठाकर थोड़ी देर के लिए किनारे रख देना चाहिए. सिर हलका होगा तो तकलीफ़ भी कम होगी और आंखों को भी आसमान की ऊंचाईयों को निहारने का मौका मिलेगा. असम के कामरूप जिले के गांववालों ने कुछ ऐसा ही किया. सरकार के आगे गिड़गिड़ाने के बजाए उन्होंने खुदमुख़्तार बनना बेहतर समझा. गांव वालों ने जलजली नदी पर लकड़ी का पुल बनाने के लिए ख़ुद से ही एक करोड़ रुपये इकट्ठा कर लिए. 

दरअसल, दशकों से मानसून के दौरान जलजली नदी को पार करना गांव वालों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था. स्कूली बच्चे हों या मरीज़ या फिर खाने की व्यवस्था हर काम के लिए नाव के सहारे ही नदी को पार करना पड़ता था.   

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सरकार से अपील की गई लेकिन भोले-भाले गांव वालों को पता ही नहीं था कि नेताओं के पास सिर्फ़ वादों के लिए मुंह होता है, तकलीफ़ें सुनने वाले कान वो कुर्सी पर बैठते ही मेज़ की दराज में रख देते हैं. फ़रियाद अनसुई रह गई. ऐसे में गांव वालों ने ख़ुद ही पुल के लिए पैसे इकट्ठा करने की तैयारी कर ली. 2018 में बनना शुरू हुए इस 335 मीटर लकड़ी के पुल के लिए नगरबेड़ा के दस गांवों के 7,000 से अधिक लोगों ने मिलकर 1 करोड़ रुपये जमा कर लिए.  

बता दें, असम के कुल क्षेत्रफल का क़रीब 40 फ़ीसदी बाढ़ प्रवण क्षेत्र है और ये भारत के कुल बाढ़ प्रभावित एरिया का लगभग 9.4 प्रतिशत है

हालांकि, यहां के लोग अभी भी सरकार से पूरी तरह नाउम्मीद नहीं हुए हैं. स्थानीय निवासी ने बताया कि ग्रामीणों ने सरकार से एक कंक्रीट का पुल बनाने के लिए कहा है.