समाज में कुछ भी बदलने के लिए सबसे पहले ख़ुद की सोच को बदलना पड़ता है. एक अकेला इंसान क्या ही कर सकता है? ये सवाल नहीं बल्कि एक ऐसी मानसिकता है, जो न ख़ुद कुछ करती है और न ही औरों को कुछ करने के लिए प्रेरित करती है.   

हम भूल जाते हैं कि मंज़िल कितनी भी दूर हो, मगर छोटे-छोटे क़दमों से तय हो ही जाती है. उसी तरह प्रयास कितने भी छोटे हों, पर समाज पर बड़ी छाप छोड़ जाते हैं. आज हम ऐसे ही लोगों की कहानियां आपको बताएंगे, जिन्होंने अपने प्रयासों से अपने समाज में बड़े-बड़े बदलाव किए और आज उनके काम ही उनकी पहचान बन गए हैं.  

1.कलेक्टर, जो पिछले 6 वर्षों से HIV पॉज़िटिव बच्चों को खिला रहा है पौष्टिक भोजन   

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Srikakulam, हैदराबाद से 730 किमी दूर एक शहर है. यहां के 210 बच्चे एचआईवी/एड्स से पीड़ित हैं. इस बीमारी में इम्यून सिस्टम बुरी तरह प्रभावित होता है, जिसे पौष्टिक भोजन से मज़बूत किया जा सकता है. ऐसे में जिले के कलेक्टर जे. निवास इन बच्चों की मदद के लिए आगे आए.   

वो पिछले छह वर्षों से हर महीने अपने शहर में एचआईवी पॉज़िटिव बच्चों को पौष्टिक भोजन प्रदान कर रहे हैं. यहां तक उन्होंने एक HIV पॉज़िटिव बच्चे की पूरी ज़िम्मेदारी ख़ुद पर ले ली है और हम महीने उसे पौष्टिक किट मुहैया कराते हैं.  

उन्होंने बताया कि पूर्व गोदावरी के जिला कलेक्टर Muddada Ravi Chandra से उन्हें ये आइडिया आया. ‘मैंने उनसे प्रेरित होकर तेलंगाना में आदिलाबाद जिले के एक एचआईवी पॉज़िटिव लड़के को गोद लेने का फ़ैसला किया. मैं हर महीने अंडे, हॉर्लिक्स, आटा, गुड़, तेल, चावल और कुछ अन्य पौष्टिक वस्तुओं के साथ एक पोषण किट प्रदान करता हूं.’  

2. शिक्षा से आदिवासियों की ज़िंदगी बदलने में लगा है एक शिक्षक  

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आंध्र प्रदेश के किरण नाइक कहने को तो महज़ एक शिक्षक हैं, लेकिन वो इससे बढ़कर कई लोगों के प्रेरणा स्त्रोत हैं. किरण नाइक को आदिवासियों के दरवाज़े तक शिक्षा पहुंचाने के लिए जाना जाता है.  

किरण, Atmakur मंडल के Nallamala जंगल में संजीव नगर थांदला से हैं और श्रीशैलम में आदिवासियों के लिए सरकारी मॉडल आवासीय पॉलिटेक्निक में लेक्चरेर के तौर पर काम करते हैं. वो लगातार आदिवासी बच्चों के पेरेंट्स को अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने के लिए समझाते हैं, ताकि उनका जीवन सुधर सके.   

उन्होंने बताया कि, ‘मैं आदिवासी छात्रों को डिप्लोमा कोर्स की पढ़ाई के लिए प्रेरित करने के लिए प्रकासम और कुरनूल जिलों में कई स्कूलों और दूरदराज के आदिवासी इलाकों में दौरा कर चुका हूं.’  

उनके प्रयासों से 2016-17 के शैक्षणिक वर्ष में 36 आदिवासी युवा शामिल हुए. वहीं, कॉलेज में विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए कम से कम 150 छात्रों की ने हिस्सा लिया. देश के भविष्य को आकार देने के लिए वो लगातार कोशिशों में लगे हैं. इसी का नतीजा है कि उन्हें काकीनाडा में एंजेल ग्लोबल यूनिवर्सिटी ने उत्कृष्टता नेतृत्व और प्रबंधन के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है.  

3. शख़्स ने 15 साल में बंजर भूमि पर लगा दिए 10 हज़ार पौधे  

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माउंटेन मैन दशरथ मांझी से प्रेरित बिहार के गया जिले के सत्येंद्र गौतम मांझी ने 15 सालों में 10 हज़ार पेड़ लगाकर एक बंजर भूमि को हरा-भरा बना दिया. उन्होंने ये सारे पेड़ बेलागंज में फल्गु नदी के नज़दीक की बंजर भूमि पर लगाए हैं. ख़ास बात ये है कि उनके लगाए गए ज़्यादातर पेड़ अमरूद के हैं.  

उन्होंने कहा, ‘दशरथ मांझी ने मुझे इस क्षेत्र में पेड़ लगाने के लिए कहा था. उस समय ये जगह बंजर और सुनसान थी और हर जगह केवल रेत थी. शुरुआत में काफी परेशानी हुई. पौधों के लिए एक बर्तन में घर से पानी लाना पड़ता था.’    

बता दें, इन पेड़ों को जानवरों से बचाने के लिए उन्होंने चारों ओर बाड़ भी लगाई है. वो आज भी इनकी सुरक्षा करते हैं.  

4. बिहार के एक शिक्षक जो खेल से बदल रहे हैं लड़कियों की क़िस्मत  

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बिहार के सिवान जिले के लक्ष्मीपुर गांव में एक 47 वर्षीय सरकारी स्कूल के शिक्षक संजय पाठक लड़कियों को मुफ़्त में स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग देते हैं. यूं तो पेशे से भूगोल के शिक्षक संजय कोई औपचारिक कोच नहीं है, फिर भी वो उन्होंने पिछले क़रीब 10 सालों में फुटबॉल, हैंडबॉल, एथलेटिक्स और अन्य खेलों में 70 से ज़्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी दिए हैं.  

संजय गांव में ‘रानी लक्ष्मीबाई स्पोर्ट्स अकादमी’ चलाते हैं, जहां उनके साथ वर्तमान में 55 लड़कियां ट्रेनिंग कर रही हैं. संजय, अपनी सैलरी से ही खिलाड़ियों के लिए खेलने और खाने-पीने के सामान का इंतज़ाम करते थे. इसके लिए उन्होंने अपनी सोने की अंगूठियां तक बेच दीं. यहां तक अपनी पत्नी के जेवर 35 हज़ार पर गिरवी रखकर एक बिल्डिंग तैयार कराई.  

इसके बावजूद भी उन्हें दकियानूसी समाज के घटिया सवालों का सामना करना पड़ा. किसी ने उनके सिर्फ़ लड़कियों को ट्रेनिंग देने पर सवाल उठाए तो कुछ ने उन पर गांव की संस्कृति और लड़कियों को खराब करने का इल्ज़ाम लगा दिया. हालांकि, इसके बावजूद भी संजय अपने मकसद से नहीं डिगे. उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज दूसरे लोग भी उनकी मदद को आगे आ रहे हैं.  

5. 88 वर्षीय ग्राम पंचायत प्रमुख ने बदली गांव की दशा  

अज्जी (कन्नड़ में दादी) कहलाने वाली 88 वर्षीय दक्षणायनम्मा, चिक्का यमनिगुरु ग्राम पंचायत की प्रमुख है. वो लगातार अपने गांव के हालात बदलने के लिए काम कर रही हैं. वो 7,500 की आबादी वाले चिक्का यमनिगुरु, चिक्कनकट, कोडागावल्ली, कोडागावल्ली हट्टी, कुठालू, होसहल्ली और अयनाहल्ली गांवों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं.   

भले ही वो ख़ुद 7वीं क्लास तक पढ़ी हों, लेकिन इसके बाद भी उन्हें शिक्षा का महत्व भली-भांति पता है. इसके साथ ही वो गांव में स्वास्थ्य, स्वच्छता और लाईट को भी महत्व देती हैं. साथ ही वो चाहती हैं कि गांवों के विकास के लिए मनरेगा को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए.  

दक्षणायनम्मा इस उम्र में भी सुबह 5 बजे गांव के कामों की देख-रेख करने के लिए निकलती हैं, और लोगों की समस्याओं को सुनती हैं. वो कहती हैं, ‘मैं वृद्ध नहीं हूं. मैंने जीवन को देखा है, और मैं हमेशा गांव को विकास की राह पर ले जाने के लिए अपने अनुभवों का इस्तेमाल करती रहूंगी.’  

बता दें, उनके प्रयासों से गांव वाले इतना ख़ुश हैं कि उन्हें अपने कामों के लिए किसी भी सीनियर अधिकारी की ज़रूरत महसूस नहीं होती है.  

6. सेक्स वर्कर और उनके बच्चों का जीवन संवार रही है दिल्ली पुलिस की ये सब-इंस्पेक्टर  

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लेडी सिंघम के नाम से मशहूर किरण सेठी दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं. वो जीबी रोड की सेक्स वर्कर और उनके बच्चों की ज़िंदगी संवारने के लिए काम कर रही हैं. 2019 में किरण सेठी का इस थाने में ट्रांसफ़र हुआ था. कोरोनाकाल में जब जीबी रोड की सेक्स वर्कर्स पर विपदा आन पड़ी तो सेठी जी ने ही उनका हाथ थामा था. उन्होंने उनके चेकअप के लिए डॉक्टर्स अरेंज किए. उन्हें आत्मरक्षा के गुर सिखाए. साथ ही योगा सेशन का भी आयोजन किया.  

इतना ही नहीं, जब उन्हें पता चला कि इस दलदल में फंसी एक बच्ची का सपना डॉक्टर बनने का हैं, तो उन्होंने उसे यहां से निकालकर चाइल्ड वेलफ़ेयर कमेटी में डाला, जहां वो अपना सपना साकार करने में जुटी है. इसके अलावा, किरण सेक्स वर्कर्स के बच्चों की फ़ीस ख़ुद अपनी जेब से देती हैं.   

जूडो में ब्लैक बेल्ट किरण सेठी को 2015 में महिला दिवस के अवसर पर पूर्व गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 5000 हज़ार लड़कियों को सेल्फ़ डिफ़ेंस की ट्रेनिंग देने के लिए सम्मानित भी किया था.