देश 'क़ैद' है, मगर मुश्क़िलें आज़ाद. कोरोना वायरस मौत का ख़तरा बन कर आया है, लेकिन यहां तो ज़िंदगी अपने आप में ही एक जंग है. एक ऐसी लड़ाई है, जहां अपनों के लिए जीतने की कोशिश हर रोज़ ख़ुद को शिकस्त देती है. असम की रहने वाली मां की भी कुछ ऐसी ही दास्तां है.

newindianexpress की रिपोर्ट के मुताबिक़, 25 साल की एक विधवा मां अंजना गोगोई अपने 18 महीने के बच्चे को लेकर 8 दिन तक चलती रहीं. उन्होंने 100 किलोमीटर का फ़ासला तय किया, तब कहीं उन्हें पुलिस की मदद मिल पाई.

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दरअसल, अंजना ऊपरी असम के Golaghat जिले Sarupathar में अपने ससुराल में रहती थीं. 24 मार्च को उन्हें अपना ससुराल छोड़कर 130 किलोमीटर दूर Lahing में स्थित Hemlai में अपने माता-पिता के घर जाना पड़ा.

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कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन था. जिसकी वजह से घर पहुंचने के लिए कोई भी साधन नहीं मिला. लेकिन अंजना के पास सफ़र पर निकलने के अलावा कोई चारा नहीं था. ऐसे में उन्होंने अपने 18 महीने के बच्चे को लेकर पैदल ही निकलने का फ़ैसला किया.

वो लगातार 8 दिन तक पैदल ही चलती रहीं, इस दौरान रास्ते में गांव वालों ने उनकी मदद भी की. आख़िरकार 100 किलोमीटर चलने के बाद वो Jorhat District में स्थित Mariani पहुंचीं. यहां पहुंचने के बाद ही उन्हें पुलिस की मदद मिल पाई, तब जाकर वो अपने घर पहुंचीं.

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Mariani Police Station के इंचार्ज इंस्पेक्टर तिलक बोरा ने बताया कि कुछ लोगों ने उन्हें इस महिला के बारे में बताया था.

‘बुधवार को हमें महिला के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद एक टीम को भेजकर Rail Township के बाहरी इलाक़े Natunmati से हम उन्हें लेकर आए.’

यहां लाकर सबसे पहले उनका चेकअप किया गया, जिसके बाद उन्हें खाना खिलाकर गाड़ी से घर छोड़ा गया.

साथ ही उन्होंने बताया कि, ‘डेढ़ साल पहले महिला के पति की मौत हो गई थी. महिला ने बताया कि रास्ते में लोगों की ओर से उसके रहने और खाने का इंतज़ाम किया गया था. उसके साथ एक मासूम भी था, शायद इसलिए लोगों ने उसकी मदद की. उसने बताया कि ससुराल वाले उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे थे, जिसके कारण उसे घर छोड़ना पड़ा. हालांकि, इस वक़्त उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था.’

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बता दें, कोरोना वायरस और लॉकडाउन के चलते सैकड़ों लोग पैदल ही अपने घर पहुंचने को मजबूर हैं. कुछ रोज़गार न होने के चलते शहरों को छोड़कर घर जा रहे हैं, तो कुछ की कहानी अंजना जैसी है. मगर सभी इस वक़्त असहनीय पीड़ा से गुज़र रहे हैं. प्रशासन की तरफ़ से भी उन्हें कुछ ख़ास राहत नहीं मिल पा रही. ऐसे में ये लोग पतझड़ को अपनी नियति मानकर कांटोंभरा रास्ता तय करने को मजबूर हैं.