देवभूमि उत्तराखंड... यहां के पहाड़ों में घूमने के लिए दुनिया के कोने-कोने से लोग आते हैं. चाहे वो पहाड़ों की ख़ूबसूरती हो या 'वो वाली घास' हो. यहां हर तरह के यात्री के लिए कुछ न कुछ है.


देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी के बारे में पूछा जाये तो बच्चे, बड़े और ज़्यादातर लोग जवाब देंगे, 'देहरादून'. मीडियावाले, सामान्य ज्ञान की किताबें यही बताती है, राज्य और राज्यधानी वाले मानचित्र भी यही बताते हैं.

अगर हम कहें कि देहरादून, उत्तराखंड की टेम्पररी राजधानी है तो हम पर फ़ेक न्यूज़ फैलाने का आरोप लगेगा लेकिन सच्चाई यही है. राइटर को भी आज ही पता चला और इसलिए तो आर्टिकल भी किया जा रहा है.

उत्तराखंड के आधिकारिक वेबसाइट पर भी ये जानकारी है.

उत्तराखंड के पास क्यों नहीं है राजधानी


8 नवंबर, 2000 को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को अलग किया गया था. राज्य तो बन गया पर राजधानी फ़िक्स नहीं हो पाई. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग करने वालों ने गैरसैंण को राजधानी बनाना चाहते थे. उनका कहना था कि इसे राजधानी बनाने से पूरे उत्तराखंड का विकास होगा और हर उत्तराखंड वासी तक लाभ पहुंचेगा.

विडंबना ये है कि राज्य बनने के लगभग 20 साल बाद, बीजेपी, कांग्रेस दोनों सरकारों के अधीन रहने के बावजूद भी उत्तराखंड को कोई राजधानी नहीं मिली. कांग्रेस हो या बीजेपी की सरकार दोनों ने ही गैरसैंण को राजधानी बनाने के वादे तो किए पर निभा न पाए.

Source: Wikipedia

देहारदून को क्यों बनाया गया राजधानी


देहरादून, राज्य के एकदम कोने में है लेकिन ये उस समय उत्तराखंड का सबसे विकसित शहर था. कोई परमनेंट राजधानी न बनने की हालत में देहरादून को राज्य का टेम्पररी कैपिटल बनाया गया. और आज तक राज्य की परमनेंट राजधानी नहीं बन पाई है.

हर विधानसभा चुनाव में पार्टियों के घोषणा पत्र में राजधानी वाली बात ज़रूर होती है पर अब तक राज्य को राजधानी नहीं मिल पाई है. राज्य के दो ऐसेंबली भी बन गये हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, साल में एक ऐसेंबली सेशन गैरसैंण में होता है और बाक़ी देहरादून में.

एक रिपोर्ट के अनुसार, गैरसैंण को इसलिए भी राजधानी नहीं बनाई जा रही क्योंकि ये काफ़ी अविकसित क्षेत्र है. गैरसैंण एक ऐसा क्षेत्र है जो पहाड़ी संस्कृति का आईना है. राजनैतिक कारणों से अभी तक उत्तराखंड के बाशिंदों को परमनेंट राजधानी नहीं मिली है.