हम बचपन में पढ़ते थे, जहां चाह वहां राह. बड़े होने के बाद ये कहावत फ़िल्मी डायलॉग भी बन गई, 'किसी चीज़ को शिद्दत से चाहो तो पूरी क़ायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है.' मूल बात वही है कि अगर कुछ चाहते हो तो सब छोड़ दो और उसके पीछे लग जाओ. पश्चिम बंगाल के ज़िला पुरूलिया के झाड़बाग्दा गांव के लोगों ने भी जी-जान से एक चीज़ चाही और फिर सालों बाद उनका सपना साकार हो गया.

The Better India की कहानी के मुताबिक़, 1997 तक झाड़बाग्दा एक पहाड़ पर मंदिर के बगल में सिर्फ़ एक पेड़ था. गांववाले पंडित कभी-कभी मंदिर में जाते थे. जमशेदपुर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ये गांव एक वक़्त पर 50 किलोमीटर की बंजर ज़मीन से घिरा था. यहां गर्मियों में लोगों की स्थित बेहद ख़राब हो जाती थी. पहाड़ी के नीचे स्थित गांव के लगभग 300 घरों के लोग गर्मियों में काफ़ी परेशान होते थे. 

Source: The Better India

लगभग 22 साल बाद, 2020 में गांव के बाहर की बंजर ज़मीन अब हरी-भरी हो गई है. यही नहीं यहां जानवर भी आने लगे हैं. किसी समय पानी की कमी से जूझते गांववाले, अब साल में 2 बार खेती करते हैं. और इस सबका क्रेडिट जाता है यहां के गांववालों को, जिन्होंने अपनी मेहनत से बंजर ज़मीन में भी सोना उगा दिया.

NGO Tagore Society for Rural Development (TSRD) की मदद से गांववाले पेड़ लगाने लगे. पेड़ों की वजह से इस क्षेत्र का तापमान भी सही रहता है, ग्राउंडवॉटर का लेवल बढ़ा है और गांववाले भी उन्नति कर रहे हैं.

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The Better India से बात-चीत करते हुए 50 वर्षीय सुजीत मोहंती ने बताया कि पहले यहां बहुत ज़्यादा गर्मी थी. पत्थरों से हीट वेब निकलते थे और इसका असर रात तक रहता है. शाम ढलने के बाद भी गर्मी से राहत नहीं मिलती थी. किसान साल में दाल, अनाज या धान की एक ही फसल उगा पाते थे. 

हमने तो कभी सोचा ही नहीं था कि इस ज़मीन पर कोई कुछ उगा सकता है. 60 प्रतिशत तक बारिश का पानी ज़मीन पर ही रह जाता था और ग्राउंडवॉटर भी बेहद जल्दी ख़त्म हो जाता था. 

                    - सुजीत मोहंती

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1997 में TSRD की एक टीम यहां पहुंची और यहां वृक्षारोपण शुरू किया. एनजीओ टीम के लीडर, बादल महाराणा 

हमें पता चला कि उस क्षेत्र में दशकों पहले हरा घना जंगल था. लेकिन ज़मीनदारी प्रथा कि वजह से वहां का वातावरण नष्ट हो गया. 

                    - बादल महाराणा

बादल ने बताया कि 1998 में TSRD ने उस क्षेत्र में काम शुरू किया और अगले 5 साल में 36,000 पेड़ लगाए. 

हमने 4 सालों तक पेड़ों की देखभाल और सुरक्षा की. इसके बाद भी पेड़ों की देख-रेख और सुरक्षा जारी रही. हमने 72 प्रजातियों के 4.5 लाख पेड़ लगाए. इनमें से 3.2 लाख पेड़ बच पाए. पानी की कमी की वजह से पेड़ों को पानी देने में समस्या होती. 

                    - बादल महाराणा

महाराणा ने ये भी बताया कि शुरुआती दिनों में सिर्फ़ 3 गांववाले उनकी सहायता के लिए आगे आए. ज़्यादातर गांववालों का यही मानना था कि उस स्थान पर कुछ नहीं उग सकता. TSRD और गांववालों की मेहनत रंग लाने लगी और 2007 में 11 हाथियों का झुंड उस जंगल में पहुंचा. महाराणा ने ये भी बताया कि उस जंगल में माइग्रेटरी पक्षी, सांप और छोटे जानवर भी आने लगे. 

TSRD के ट्रेज़रर, नंदलाल बक्षी का कहना था कि जंगल ख़ुद को रिजेनरेट करने लगा है और अब वहां 5.28 लाख से ज़्यादा पेड़ हैं. प्लांटेशन ड्राइव्स के दौरान गांववालों ने ग्राउंडवॉटर को जमा करने के लिए खुदाई भी कर दी. 

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इस ग्रीनज़ोन का फ़ायदा गांववालों को ही हुआ. यहां की मिट्टी में बढ़ती नमी की वजह से किसान साल में 2 फसल उगाने लगे. सिर्फ़ झाड़बाग्दा के लोगों को ही नहीं आस-पास के 21 गांव के लोगों को भी इस ग्रीनज़ोन का फ़ायदा हुआ. 

बख्शी ने ये भी बताया. इस जंगल की रक्षा के लिए गार्ड रखा गया है. कोई पेड़ काटने या बिना परमिशन जंगल से कोई कुछ भी नहीं ले सकता. सिर्फ़ बूढ़े, सूखे या गिरे पेड़ की लकड़ियां ही जलावन के लिए काटी जाती हैं. रोज़ाना अलग-अलग गांव की 6 महिलाएं यहां सूखे पत्ते इकट्ठा करने आती हैं. 

कहानी कैसी लगी कमेंट बॉक्स में बताइए.