दीपावली प्रकाश का त्यौहार है. ऐसा त्यौहार जो अंधेरे को ख़त्म कर हमारी ज़िंदगियों में ख़ुशियों का उजाला फैलाता है. ऐसे में ये ज़रूरी हो जाता है कि, ये उजाला सिर्फ़ हमारी चौखट तक ही सीमित न रहे, बल्कि दुनिया के हर शख़्स की ज़िंदगी में फैले अंधेरे को ख़त्म करे. 

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इसके लिए आपको बस 'बायोडिग्रेडेबल मूर्तियों और दीयों' का इस्तेमाल करना है. ऐसा कर के आप न सिर्फ़ पर्यावरण पर छाए प्रदूषण के अंधेरे को ख़त्म करेंगे, बल्कि उन महिलाओं की ज़िंदगी में भी ख़ुशियों का चिराग जला पाएंगे, जिन्होंने इन्हें अपने हाथों से बनाया है.

दरअसल, 'कान्हा उपवन और एलएमसी' ने स्वयं सहायता समूहों (SHG) की क़रीब 2,200 महिलाओं को 'गोमई' (गाय के गोबर) से दीया और गणेश-लक्ष्मी समेत अन्य भगवानों की मूर्तियां बनाने का प्रशिक्षण दिया है. इसके ज़रिए लखनऊ की महिलाएं इस साल थोड़ा बहुत कमाई कर पाएंगी. ट्रेनिंग के अलावा कच्चा माल और खुदरा काउंटर भी महिलाओं के लिए उपलब्ध कराए गए हैं.

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कान्हा उपवन के प्रबंधक यतेंद्र त्रिवेदी ने कहा, 'जो लोग इन उत्पादों को ख़रीदना चाहते हैं, वे नगर निगम द्वारा इन महिलाओं को दिए गए स्टॉल पर जा सकते हैं. शहर के विभिन्न बाज़ारों और मॉलों में 30 स्टाल लगाए गए हैं. कुछ महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने के लिए गाड़ियां भी दी गई हैं'.

गौरतलब है कि काऊडंग से बने उत्पाद 'बायोडिग्रेडेबल' होते हैं और इसका उपयोग पौधे के पोषक तत्व के रूप में भी किया जा सकता है. इसके साथ ही इन मूर्तियों का दाम भी मिट्टी से बनी मूर्तियों की तुलना में कम होता है. ये अलग-अलग आकारों में उपलब्ध हैं और टिकाऊ भी हैं.