दिल्ली में लगभग एक सदी से दशहरा मनाने की और रामलीला करने की परंपरा रही है. आज हम आपको बता रहे हैं कि इतने सालों में कैसे रामलीला मुग़लों से होती हुई मशीनों तक पहुंच गयी है.

19वीं सदी में मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र के समय से ही लाल किले में दशहरा मनाने की परंपरा रही है. संस्मरण 'बाज़म-ए-अखिर' के अनुसार, दशहरे के दिन सोने और चांदी की काठी वाले घोड़े यमुना किनारे की रेत पर लाल-किले के पास दौड़ाये जाते थे. शाही अस्तबलों में घोड़ों को सजाया जाता था.

कहा जाता है कि आज से 350 साल पहले से दिल्ली में रामलीला होती आई है. मुग़लों के दरबार में भी उर्दू में तुलसीदास की रामायण सुनाई जाती थी.

19वीं शताब्दी के लेखक मौलवी ज़ाकी उल्ला ने लिखा है कि वज़ीराबाद छावनी में शहर की सीमा से तीन मील की दूरी पर एक और प्रदर्शन आयोजित किया जाता था, जिसके लिए हिंदू और मुस्लिम सैनिक संयुक्त रूप से दान किया करते थे.

1857 में रामलीला की जगह बदली गयी, फिर ये तीस हज़ारी बाग़ में हुई और फिर अजमेरी गेट पर होने लगी.

आज़ादी के बाद

मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद डोनेशन से रामलीला की जाने लगी. दिल्ली कपड़ा मिल के कर्मचारियों ने एक रामलीला का आयोजन किया था, जिसमें पहली बार हनुमान को उड़ते हुए दिखाया गया था. करोल बाग, शास्त्री नगर, देव नगर समेत कई इलाकों में चंदे से रामलीला की जाती थी.

हिस्टोरियोग्राफ़र और प्रसिद्ध इतिहासकार आर.वी. स्मिथ ने कहा था कि जो लोग रामलीला मैदान में नहीं जा पाते थे, वे डीसीएम मैदान आते थे. ये अपने विशालकाय पुतलों के लिए भी जाना जाता था.

डीसीएम परिसर में दशहरे के समय मेला लगा करता था. 1957 से राम के जीवन पर आधारित नृत्य-नाटिका का आयोजन होने लगा. यह फिरोज़ शाह कोटला मैदान पर शुरू किया गया था, लेकिन 2000 में इसे कोपरनिकस मार्ग पर केंद्र के परिसर में एक नए स्थान पर ले जाया गया. तीन घंटे के संगीत कार्यक्रम में रामायण को पूरा किया जाता था.

रामलीला सवारी

रामलीला सावरी एक परंपरा थी, जो 170 वर्षों से अधिक समय तक अखंड रही. 12 दिनों तक राम, लक्ष्मण, सीता और रावण के रूप में तैयार किए गए कलाकारों को एक जुलूस में दिखाया जाता था. तीन घंटे की लंबी यात्रा एस्प्लेनेड रोड के दाजी मंदिर से शुरू होती दारिबा, चांदनी चौक, मुख्य सड़क, नयी सड़क, चावड़ी बाज़ार, चौक हौज़ काज़ी और अजमेरी गेट तक जाती. उसी राह से ये जुलूस वापस भी लौटाया जाता था.

रामलीला समिति (एसआरसी) सबसे पुरानी एसोसिएशन है, जो इसे आयोजित कर रही है. बीते सालों में रामलीला में कई बदलाव आये हैं. एक अनुमान के अनुसार, रामलीला का बजट 80 से 90 लाख तक का होता है. टेक्नोलॉजी की मदद से ये ज़्यादा भव्य तो हो गयी है, लेकिन लोगों में इसके लिए उत्साह ज़रा कम हुआ है.

Source:Hindustantimes