आज बेशक हिंदुस्तान में मोहम्मद अली जिन्ना का नाम लेना गुनाह समझा जाता हो, पर एक हक़ीक़त ये भी है कि आज़ाद हिंदुस्तान की तक़दीर लिखने में उनका भी महत्वपूर्ण योगदान था. भले ही बाद में पाकिस्तान की मांग में उनका जुड़ने के कारण उनके योगदान को भुला दिया गया. हाल ही में आई वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र पंडित द्वारा लिखित किताब ‘रिटर्न ऑफ़ दी इन्फिडेल’ ऐसे ही कुछ पहलुओं से पर्दा उठाती है.

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इस किताब के ज़रिये विरेदंर पंडित ने इतिहास की कुछ ऐसी परतों को छूने की कोशिश की है, जिसे पहले कभी छेड़ने की कोशिश ही नहीं की गई. इस किताब में ये भी दावा किया गया है कि अगर जिन्ना मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग नहीं करते, तो साल 2050 तक हिंदुस्तान में मुसलमानों की आबादी 75 करोड़ के आस-पास हो जाती और हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश होता. इस किताब की माने, तो जिन्ना की वजह से ही हिंदुस्तान में हिन्दुओं की आबादी बढ़ी है.

वीरेन्द्र पंडित अपनी किताब में कहते हैं कि 'असल मायने में गांधी नहीं, बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना ही भारत के राष्ट्रपिता थे, जो ‘बांसुरीवाला’ कहानी के किरदार की तरह बांसुरी बजाते हुए मुसलमानों को हिंदुस्तान से बाहर ले कर चले गए थे. उन्हीं की वजह से दुनिया के नक़्शे पर मुसलमानों के नए देश का उदय हुआ, जो पाकिस्तान कहलाया.’ वीरेंद्र इस लिहाज से जिन्ना को गौतम बुद्ध, चाणक्य और आदिशंकर के बाद सबसे महान हिंदुस्तानी मानते हैं.

इस किताब में वीरेंद्र कहते हैं कि 'जिन्ना का असली नाम मामदभाई जिनियाभाई ठक्कर था, जिसे वो एम जे ठक्कर लिखते थे.' इसके साथ ही ये किताब कहती है कि ‘जिन्ना और गांधी एक-दूसरे के बिना शून्य थे. वो बारी-बारी से एक-दूसरे के कंधे पर पैर रख कर ऊपर चढ़े थे. हालांकि, गांधी को इस मामले में थोड़ा तेज कहा गया कि वो अपनी बात दूसरों से बखूबी मनवाना जानते थे.'

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ख़ैर, इस किताब को पढ़ कर ही पूरी सच्चाई को पहचाना जा सकता है. एक बार और समझनी होगी कि किताब लेखक की अपनी रचना है. इसे पूर्ण इतिहास नहीं समझाना चाहिए. बाकि जिन्ना के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता.

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