सन् 1907 में 28 सितंबर को एक सिरफिरा पैदा हुआ था, जिसे उसूल ज़िंदगी से ज़्यादा प्यारे थे. जिसने सबके लिए समानता का सपना देखने की हिमाकत की थी. जो सांप्रदायिकता को हमारी दुनिया के लिए सबसे बड़ी समस्या मानता था. जिसका मानना था कि किसी की जान लेना तो आसान है, मगर उसके विचारों को मारना असंभव है. जिसने 23 साल की छोटी उम्र में ही इतना सबकुछ पढ़-लिख लिया था, जितना बड़े-बड़े पूरी ज़िंदगी में नहीं कर पाते. जिसने कैद में ही मार्क्स व एंजिल के विशाल साहित्य के साथ-साथ 700 किताबें पढ़ डाली थीं. जो फांसी के फंदे पर लटकने से पहले भी लेनिन की किताब का पन्ना मोड़ गया था. जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सबको एक धागे से बांधने वाला नारा 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' दिया था. जो महात्मा गांधी के सिद्धांतों से सहमत नहीं था, तो अपनी असहमति को छिपाने की कोई कोशिश नहीं करता था. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किसके बारे में बात कर रहा हूं...

जी हां, आपने बिल्कुल सही पकड़ा. मैं भगत सिंह के बारे में ही बात करना चाह रहा हूं. भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान) में हुआ था. उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से पढ़ाई की थी. वे जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद इतने व्यथित हो गए थे कि उन्होंने अकेले दम पर ही अंग्रेज़ी साम्राज्य को हिन्दुस्तान से उखाड़ फेंकने की ठान ली थी. वे एक बेहतरीन शायर, कवि, प्रेमी, बेटे, दोस्त और न जाने क्या-क्या थे. इसके अलावा उन्होंने बहुत कुछ लिखा भी है, जो हम-सभी के लिए प्रेरणा और धरोहर है. तो आइए हम आपको रूबरू कराते हैं भगत सिंह द्वारा लिखे गए लेख, 'मैं नास्तिक क्यों हूं' से.

ये बीते दौर में जितना प्रासंगिक था, आज उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है...

प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी.

प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा. यदि काफ़ी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धांत या दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है.

उसका तर्क असत्य, भ्रमित या छलावा और कभी-कभी मिथ्या हो सकता है. लेकिन उसको सुधारा जा सकता है. क्योंकि, विवेक उसके जीवन का दिशा-सूचक है. लेकिन निरा विश्वास और अंधविश्वास ख़तरनाक है. यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है. जो मनुष्य यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी.

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यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेंगे. तब उस व्यक्ति का पहला काम होगा, तमाम पुराने विश्वासों को धराशायी करके नए दर्शन की स्थापना के लिए जगह साफ़ करना. यह तो नकारात्मक पक्ष हुआ. इसके बाद सही कार्य शुरू होगा, जिसमें पुनर्निर्माण के लिए पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग किया जा सकता है.

हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है. इसको दिशा देने के लिए पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है. यही हमारा दर्शन है.

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जहां तक नकारात्मक पहलू की बात है, हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं-

(अ) यदि, जैसा कि आपका विश्वास है, एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक एवं सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने कि पृथ्वी या विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की?

(ब) कष्टों और आफ़तों से भरी इस दुनिया में असंख्य दुखों के शाश्वत और अनंत गठबंधनों से ग्रसित एक भी प्राणी पूरी तरह सुखी नहीं.

कृपया, यह न कहें कि यही उसका नियम है. यदि वह किसी नियम में बंधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं. फिर तो वह भी हमारी ही तरह गुलाम है.

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कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका शग़ल है.नीरो ने सिर्फ़ एक रोम जलाकर राख किया था. उसने चंद लोगों की हत्या की थी. उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने शौक और मनोरंजन के लिए.और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं?

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सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाए जाते हैं. जालिम, निर्दयी, शैतान-जैसे शब्दों से नीरो की भर्त्सना में पृष्ठ के पृष्ठ रंगे पड़े हैं. एक चंगेज़ खां ने अपने आनंद के लिए कुछ हजार ज़ानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं.फिर तुम उसके उन दुष्कर्मों की हिमायत कैसे करोगे, जो हर पल चंगेज़ के दुष्कर्मों को भी मात दिए जा रहे हैं?

मैं पूूछता हूं कि उसने यह दुनिया बनाई ही क्यों थी? ऐसी दुनिया जो सचमुच का नर्क है, अनंत और गहन वेदना का घर है?सर्वशक्तिमान ने मनुष्य का सृजन क्यों किया जबकि उसके पास मनुष्य का सृजन न करने की ताक़त थी?

आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धांत की निंदा की जाती है. भयभीत करने के सिद्धांत का भी अंत वही है.केवल सुधार करने का सिद्धांत ही आवश्यक है और मानवता की प्रगति का अटूट अंग है. इसका उद्देश्य अपराधी को एक अत्यंत योग्य तथा शांतिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है.

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किसी गरीब तथा अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहां पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? चूंकि वह गरीब हैं, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकता. वह अपने उन साथियों से तिरस्कृत और त्यक्त रहता है जो ऊंची जाति में पैदा होने की वजह से अपने को उससे ऊंचा समझते हैं.उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं. मान लो यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोगेगा? ईश्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी?

मैं पूछता हूं कि तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को उस समय क्यों नहीं रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है?ये तो वह बहुत आसानी से कर सकता है. उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं को या उनके अंदर लड़ने के उन्माद को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे क्यों नहीं बचाया.

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उसने अंग्रेज़ों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने हेतु भावना क्यों नहीं पैदा की?वह क्यों नहीं पूंजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत संपत्ति का अपना अधिकार त्याग दें और इस प्रकार न केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव-समाज को पूंजीवाद की बेड़ियों से मुक्त करे.

अब घुमा-फिराकर तर्क करने का प्रयास न करें, वह बेकार की बातें हैं. मैं आपको यह बता दूं कि अंग्रेज़ों की हुकूमत यहां इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताक़त है और हम में उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं. वे हमें अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हुए हैं बल्कि बंदूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे रखे हुए हैं.

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स्वभावतः तुम एक और प्रश्न पूछ सकते हो-यद्यपि यह निरा बचकाना है. वह सवाल यह कि यदि ईश्वर कहीं नहीं है तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे?मेरा उत्तर संक्षिप्त तथा स्पष्ट होगा-जिस प्रकार लोग भूत-प्रेतों तथा दुष्ट-आत्माओं में विश्वास करने लगे, उसी प्रकार ईश्वर को मानने लगे.

मेरे दोस्तों, यह मेरे सोचने का ही तरीका है जिसने मुझे नास्तिक बनाया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज़-बरोज़ की प्रार्थना-जिसे मैं मनुष्य का सबसे अधिक स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूं-मेरे लिए सहायक सिद्ध होगी या मेरी स्थिति को और चौपट कर देगी.

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देखना है कि मैं इस पर कितना खरा उतर पाता हूं. मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा.जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘देख लेना, अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैंने कहा, ‘नहीं प्रिय महोदय, ऐसा नहीं होगा. ऐसा करना मेरे लिए अपमानजनक तथा पराजय की बात होगी.

स्वार्थ के लिए मैं प्रार्थना नहीं करूंगा. पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूं.