भारत की राजनीति पर वंशवाद की गहरी छाप देखी जा सकती है. मगर इस सबके बावजूद हमारे देश में कई ऐसे भी नेता हैं जो छात्र राजनीति के रास्ते से देश की मुख्यधारा की राजनीति में दाखिल हुए.
आज देश की राजधानी में स्थापित दो मुख्य विश्व विद्यालयों में छात्र संघों के चुनाव हो रहे हैं, और आज उनमें वोटिंग का दिन है. ऐसे में सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों से चुने गए कई छात्र नेताओं ने भारतीय राजनीति में उनकी अलग पहचान बनायी है.
तो आइए हम आपको रूबरू कराते हैं देश के ऐसे 10 नेताओं से जिन्होंने उनके छात्र जीवन में छात्र राजनीति भी की है...

1. सुषमा स्वराज – भारतीय जनता पार्टी

सुषमा स्वराज ने 1970 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के साथ हरियाणा से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत की.
भारतीय जनता पार्टी के भीतर उन्हें समाजवादी विचारों की ओर झुका हुआ व्यक्तित्व माना जाता है, क्योंकि उनके पति स्वराज कौशल जॉर्ज फर्नांडीज़ के नज़दीकी माने जाते रहे हैं.
वर्तमान में वे मध्य प्रदेश के विदिशा से लोक सभा सांसद हैं और वर्तमान सरकार में विदेश मंत्री भी.
इससे पहले वे दिल्ली प्रदेश की मुख्यमंत्री, केन्द्र सरकार में सूचना-प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री और लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष भी रह चुकी हैं.
पूरा देश और राजनीतिक वर्ग उन्हें एक प्रखर नेत्री और वक्ता के तौर पर देखता है.

2. लालू प्रसाद यादव – राष्ट्रीय जनता दल

लालू प्रसाद यादव पटना यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई करते हुए पटना विश्व विद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष बने. सन् 1973 में फिर छात्र संघ चुनाव लड़ने के लिए पटना कॉलेज में दाखिला लिया और जीते भी. इसके बाद वे जेपी आंदोलन के सक्रिय सहभागी रहे और उस दौरान बनाई गई छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष भी बनाए गए.
सन् 1977 में वे जनता पार्टी के टिकट पर लोक सभा चुनाव भी लड़े और जीते. उस दौरान लालू प्रसाद यादव की उम्र 29 साल थी और वे देश के सबसे कम उम्र युवा सांसदों में से एक थे.
वे 1990-97 के दौरान संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री भी रहे, लालू प्रसाद यूपीए सरकार 2004-09 में रेल मंत्री भी रहे. फिलहाल वे किसी दौर में राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. और उनके गंवई और ठेठ अंदाज़ की वजह से उन्हें ख़ासी प्रसिद्धि भी मिलती है.

3. अजय माकन – कांग्रेस

अजय माकन सन् 1985 में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं. राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखने वाले माकन फिर दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन के ताकतवर संघ के अध्यक्ष बने.
1993, 1998 और 2003 में दिल्ली से विधायक चुने गए. 2004 में पहली बार लोक सभा के लिए चुने गए और फिर आवास और शहरी विकास मंत्री, खेल मंत्री और गृह राज्य मंत्री भी रहे.
साल 2015 में दिल्ली विधान सभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की अगुआई की, मगर कांग्रेस के लिए एक भी सीट जीतने में असफल रहे. फिलवक़्त वे दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.

4. ममता बनर्जी – तृणमूल कांग्रेस

ममता सन् 1970 में कांग्रेस के छात्र संगठन “छात्र परिषद्” की सदस्या बनीं और जल्द ही एक तेज़-तर्रार महिला नेत्री के तौर पर उभरीं.
आपातकाल और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में जादवपुर लोकसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ीं और दिग्गज वाम नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया.
वे पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में “पश्चिम बंगाल यूथ कांग्रेस” की अध्यक्ष और फिर नरसिंह राव की सरकार में मानव संसाधन मंत्री भी रह चुकी हैं.
सन् 1997 में वे कांग्रेस से अलग हो गयी, और उन्होंने “ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” बनायी. उनके संघर्षों को पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा-परखा और 2011 में उन्हें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया.

5. सीताराम येचुरी – मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी

हैदराबाद में जन्में येचुरी ने कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली में की. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान वे छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से जुड़े.
आपातकाल के विरोध में वे जेल में कैद रखे गए, और आपातकाल के बाद जेल से रिहा होने के बाद वे तीन बार जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे, वे एसएफआई के भी ऐसे पहले अध्यक्ष बने जिसका ताल्लुक बंगाल या केरल से नहीं था.
साल 2005 से येचुरी राज्यसभा सांसद हैं. इसी साल येचुरी निर्विरोध मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने गए हैं.

6. प्रफुल्ल कुमार महंत – असम गण परिषद्

असम प्रदेश की राजधानी गुवाहाटी में वकालत की पढ़ाई के दौरान वे प्रभावशाली छात्र संगठन “अखिल असम छात्र संघ” से जुड़े और सन् 1979 में उन्हें इस संगठन के अगुआई की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
गैर असमिया लोगों के ख़िलाफ़ वे आंदोलन में वे प्रभावी नेता के तौर पर उभरे और सन् 1985 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ ऐतिहासिक असम समझौते पर हस्ताक्षर किए.
सन् 1985 में ही असम गण परिषद् नामक एक पार्टी का गठन किया गया और उस साल संपन्न हुए विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी को अभूतपूर्व समर्थन मिला. जिसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. उस वक्त वे देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने थे.
2014 के आम चुनाव में एक भी सीट ना जीत पाने के बाद महंत ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. फिलहाल वे असम विधान सभा में एक विधायक हैं.

7. अरुण जेटली – भारतीय जनता पार्टी

अरुण जेटली सन् 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए थे. उस दौर में बने छात्र संगठनों और जेपी आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका रही थी.
आपातकाल में उन्हें डेढ़ साल तक जेल में रहना पड़ा. जिसके बाद वकालत की पढ़ाई पूरी कर वे सुप्रीम कोर्ट के मशहूर और वरिष्ठ वकील बने.
एनडीए सरकार में कानून मंत्री बने, पांच साल तक भारतीय जनता पार्टी के महासचिव रहे और उसके बाद राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे. वर्तमान में वे भारतीय जनता पार्टी नीत भारत सरकार में वित्त मंत्री हैं.

8. नीतीश कुमार – जनता दल (यूनाइटेड)

नीतीश कुमार भी आपातकाल के संघर्षों से निकले छात्र नेता हैं. वे आपातकाल के दिनों में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. उन्हीं दिनों वे बिहार इंजीनियरिंग महाविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए.
तत्पश्चात् जेपी आंदोलन से जुड़े और युवाओं की “छात्र संघर्ष समिति” में अहम भूमिका निभाई. सन् 1975-77 के दौरान और आपातकाल के विरोध हेतु वे जेल में भी रहे.
1985 में लोकदल से विधायक चुने गए और 1989 के बाद छह बार लोकसभा के सांसद रहे. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे रेल मंत्री थे.
वर्तमान में वे बिहार प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और आगामी बिहार प्रदेश विधान सभा चुनाव में राजद+जद(यू)+कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी भी.

9. डी राजा – कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया

तमिलनाडू के भूमिहीन मज़दूरों के घर में पैदा हुए डी राजा उनके गांव में स्नातक की डिग्री लेने वाले पहले छात्र थे.
मद्रास विश्वविद्यालय से जुड़े कॉलेजों में पढ़ाई के वक्त उन्होंने छात्र राजनीति को समझा और उसमें दखलंदाज़ा शुरु की.
साल 1994 से डी राजा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय सचिव हैं. वर्ष 2007 में वो तमिलनाडु से राज्यसभा सांसद हैं.

10. सीपी जोशी – कांग्रेस

सीपी जोशी सन् 1973 में राजस्थान के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए थे. इसके बाद वे नाथद्वारा से विधायक का चुनाव जीते. चार बार विधायक रहे और राज्य सरकार में कई मंत्रालय भी संभाले. साल 2008 में नाथद्वारा के चुनाव में मात्र एक वोट से हारे.
2009 में भीलवाड़ा से चुनाव जीत कर पहली बार लोकसभा सांसद बने. तत्कालीन यूपीए सरकार में वे ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री बने.
वे राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. फिलहाल वे कांग्रेस पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता हैं.

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