तकनीक तेज़ी से बदलती आई है और बदल भी रही है. मसलन, अब तक हम फ़ोन, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चार्ज करने के लिए जिस केबल वाले चार्जर का इस्तेमाल कर रहे थे, अब उसकी जगह धीरे-धीरे वायरलेस चार्जर (Wireless charger) ले रहा है. हालांकि, ये कोई नई तकनीक नहीं है. 19वीं शताब्दी में निकोला टेस्ला ने दो सर्किट के बीच मैग्ननेटिक फ़ील्ड बनाकर इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसफ़र की थी.

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हालांकि, इस तकनीक का अभी तक कोई प्रैक्टिकल इस्तेमाल ज़्यादा नहीं हुआ. मगर अब होने लगा है. आज, स्मार्टफ़ोन में इस तकनीक का काफ़ी इस्तेमाल होने लगा है. ऐसे में ये जानना ज़रूरी हो जाता है कि वायरलेस चार्जिंग (Wireless charging) कैसे काम करती है और इस तकनीक का क्या हमारे डिवाइस पर कोई बुरा असर पड़ता है?

कैसे काम करता है वायरलेस चार्जर (Wireless charger)?

वायरलेस चार्जिंग बिना केबल के पावर ट्रांसफ़र करने की तकनीक है. ये इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन की मदद से काम करती है. इसमें पावर ट्रांसफ़र करने के लिए मैग्नीटिक फ़ील्ड का इस्तेमाल होता है. इलेक्‍ट्रोमैग्‍नेटिक इंडक्‍शन हवा में इलेक्ट्रिक एनर्जी को रिलीज़ करता है, जिससे फ़ोन चार्ज होने लगता है.

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दरअसल, इसमें दो तरह की कॉपर कॉइल होती हैं. एक ट्रांसमीटर कॉइल जो आपके चार्जिंग स्टेशन (पैड) में होता है. वहीं, दूसरा रिसीवर कॉइल होता है, जो फ़ोन के अंदर होता है. ये दोनों कॉइल ही एक इलेक्ट्रो मैग्नीटिक फ़ील्ड तैयार करती हैं, जिसके ज़रिए पावर ट्रांसफ़र होती है. इससे फ़ोन की बैटरी चार्ज होने लगती है. 

हमारे डिवाइस पर कोई बुरा असर पड़ता है?

वायरलेस चार्जिंग में बैटरी के चार्जर सायकल पर बुरा असर तो नहीं पड़ता. मगर फ़ोन में परेशानी होती है. मसलन, वायरलेस चार्जिंग के दौरान फ़ोन ज़्यादा गर्म हो जाता है. कुछ फ़ोन तो इसे सह जाते हैं, मगर कुछ ऐसा नहींं कर पाते. हालांकि, इसके कोई ज़्यादा नुक़सान नहीं है. मगर अभी इससे बहुत ज़्यादा फ़ायदा भी नहीं हो रहा, क्योंकि ये तकनीक केबल की तुलना में उतनी सक्षम नहीं है.

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केबल चार्जर जितनी जल्दी फ़ोन को चार्ज करते हैं, उतनी तेज़ी से चार्जिंग वायरलेस में नहीं होती. साथ ही, एनर्जी लॉस भी ज़्यादा देखने को मिलता है. जिसके कारण फ़ोन चार्ज होने में देरी तो होती ही है. साथ ही, बिजली भी ज़्यादा ख़र्च होती है. इसके अलावा फ़ोन में इस तकनीक का शामिल करने पर उसकी कीमत भी काफ़ी बढ़ जाती है.