गुस्सा करना गर्म कोयले को अपने हाथ पर रखने के समान है, आप उसे दूसरे पर फेंकने को तैयार रहते हैं, पर ये भूल जाते हैं कि कोयले से आपका हाथ भी जल रहा है.बुद्ध के ये शब्द ही काफ़ी हैं ये बताने के लिए कि गुस्सा कैसे हमें नुकसान पहुंचाता है. चाय का गर्म कप हमारी उंगलियां जला देता है, पर हम गुस्से से खुद को जलाते रहते हैं.

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कपिलवस्तु के राजकुमार, सिद्धार्थ का बुद्ध बनने तक का सफ़र कठिन था, पर उनके जीवन से सीख लेना आसान है. बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में हुआ और 483 ईसा पूर्व में उन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया. गौतम गोत्र में पैदा हुए थे सिद्धार्थ, इसलिए गौतम बुद्ध नाम पड़ा. कुछ इतिहासकारों का मत है कि बुद्ध गौतमी के कारण गौतम कहलाए. शाक्यों के राजा शुद्धोधन की संतान सिद्धार्थ के लिए भविष्यवाणी की गई थी कि वो भविष्य में या तो एक महान राजा बनेंगे या एक महान पथ प्रदर्शक बनेंगे. हक़ीकत में बुद्ध दोनों ही बन गए. शांति का राज स्थापित कर, वो राजा भी बन गए और पूरा विश्व ही उनकी प्रजा थी. बुद्ध आज भी पथ प्रदर्शक हैं, आज भी हम उनके दिखाए गए रास्ते पर चलते हैं.

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बुद्ध से जुड़ी कई कहानियां हमने पढ़ी और सुनी हैं. कहानियां भी कमाल की होती हैं, हम उन्हें पढ़कर ख़ुश हो जाते हैं, हल्का महसूस करते हैं, पर उन्हें ज़िन्दगी में उतारने की कोशिश करने में पीछे रह जाते हैं.

पहली कहानी

क्या ईश्वर है?

ईश्वर के अस्तित्व पर न जाने कब से बहस हो रही है. आस्तिक-नास्तिक के इस फेरे में बुद्ध भी एक बार फंसे थे.

बुद्ध सूर्यवंशी यानि कि इक्ष्वाकु वंश के ही थे. इसी वंशावली में भगवान राम का भी जन्म हुआ था. एक सुबह बुद्ध के पास एक धार्मिक आस्तिक व्यक्ति आया. वो व्यक्ति राम का बहुत बड़ा भक्त था और उसने राम को समर्पित कई मंदिर बनवाए थे. हर वक़्त उसकी ज़बान पर राम का नाम ही रहता था.

कई सालों की भक्ति के बाद भी उस व्यक्ति ने बुद्ध से पूछा, 'क्या ईश्वर है? कृपया मुझे सच बताएं. क्या भगवान होते हैं?' बुद्ध जानते थे कि प्रश्न करने वाला व्यक्ति राम का बहुत बड़ा भक्त है. बुद्ध के उत्तर ने सबको चौंका दिया. बुद्ध ने शांत-चित्त से कहा 'नहीं. ईश्वर जैसा कुछ नहीं होता.'

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बुद्ध के शिष्य और अनुयायी इस उत्तर से बहुत प्रसन्न हुए. क्योंकि आज से पहले जब भी बुद्ध से किसी ने ये सवाल किया था तो बुद्ध शांत हो जाते थे. अब उनके पास एक उत्तर था. जल्द ही ये ख़बर दूर-दराज के इलाकों तक फैल गई.

शाम के वक़्त बुद्ध के पास फिर से सारे शिष्य और अनुयायी इकट्ठा हुए. तभी एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया. वो व्यक्ति बहुत बड़ा नास्तिक था. बड़े-बड़े शास्त्रार्थों में कई पंडितों को परास्त किया था. 1000 से भी ज़्यादा लोगों को विश्वास दिलाया था कि ईश्वर जैसा कुछ नहीं है. पर उसे भी संदेह हुआ कि अगर ईश्वर है, तो उसकी पूरी मेहनत बेकार हो जाएगी. अपने प्रश्नों को लेकर वो भी बुद्ध के पास पहुंचा.

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उस व्यक्ति ने बुद्ध से पूछा, 'सब कहते हैं कि आप परम ज्ञानी हो? कृपया बताइए क्या ईश्वर है?'

बुद्ध ने गंभीर होकर जो उत्तर दिया, उससे इस सवाल का उत्तर साफ़ हो गया. बुद्ध ने कहा, 'हां, ईश्वर है.'

बुद्ध ये जानते थे कि उनका जवाब जो भी हो, दोनों ही लोग अपना विश्वास नहीं छोड़ेंगे. वे अपने शिष्यों को बताना चाहते थे कि जीवन में विश्वास ही सब कुछ है.

बुद्ध के शिष्यों के सिर चकराने लगे. पर बात साफ़ थी. ये कोई सवाल नहीं है कि ईश्वर है या नहीं, इस पर सोचने की भी ज़रूरत नहीं. असल चीज़ है विश्वास. ये आप पर निर्भर करता है कि आप किस पर विश्वास करना चाहते हैं.

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दूसरी कहानी

बुद्ध के साथ बुरा व्यवहार

अकसर हम दूसरों के व्यवहार से दुखी हो जाते हैं या गुस्से में आ जाते हैं. बुद्ध के जीवन से जुड़ी ये कहानी आपमें बदलाव ज़रूर लाएगी.

एक बार एक बुद्ध एक गांव से गुज़र रह थे. तभी एक नौजवान आया और बुद्ध को अपशब्द कहने लगा. नौजवान ने बुद्ध को ढोंगी, झूठा और भी बहुत कुछ कहा. बुद्ध के शिष्य गुस्से से लाल-पीले हो गए, पर बुद्ध शांत रहे और मुस्कुराते रहे. बुद्ध को मुस्कुराता देख वो व्यक्ति और ज़्यादा गुस्से में आ गया और बुद्ध के लिए दोबारा अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगा. इतना सब कुछ होने के बाद भी बुद्ध मुस्कुराते रहे.

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हारकर नौजवान ने बुद्ध से प्रश्न किया, 'मैं आपको अपशब्द कह रहा हूं, पर आप मुस्कुरा रहे हैं. ऐसा क्यों?'

बुद्ध ने शालीनता से उत्तर दिया, 'तुमने मुझे अपशब्द कहे, पर मैंने उसे लिया ही नहीं. तुम्हारे शब्द तुम्हारे पास ही हैं.'

हैरान होकर नौजवान ने कहा, 'मेरे शब्द तुमने लिए नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है?'

बुद्ध ने नौजवान से पूछा, 'अगर तुम मुझे कुछ सिक्के देना चाहो और मैं उन्हें न लूं, तो सिक्के किस के पास रहेंगे?'

नौजवान ने उत्तर दिया,'मेरे पास ही रहेंगे.'

आपको कोई भी बात तभी बुरी लगेगी, जब आप उसे ग्रहण करेंगे. अगर आप उसे सुनकर भी ग्रहण न करें, तो आपको कोई भी बात बुरी नहीं लगेगी.

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तीसरी कहानी

सरसों के दाने

एक बार एक स्त्री के बेटे की मृत्यु हो गई. स्त्री इस बात को स्वीकार नहीं कर पाई और वो हर घर में जाकर अपने बेटे को जीवित करने की दवाई मांगने लगी.

किसी ने उससे बुद्ध के पास जाने को कहा. स्त्री रोती हुई बुद्ध के पास गई और अपने बेटे को जीवित करने की मांग करने लगी. ये असंभव था. बुद्ध ने स्त्री की व्यथा सुनी और उससे सरसों के दाने लाने को कहा. पर शर्त रखी कि सरसों के दाने ऐसे घर से लाने होंगे, जहां किसी की मौत न हुई हो.

स्त्री अपने गांव लौट गई और घर-घर जाकर सरसों की खोज करने लगी. स्त्री को ऐसा कोई घर नहीं मिला जहां किसी की मौत नहीं हुई हो. हारकर स्त्री एक पेड़ के नीचे जा बैठी. शांत होने पर उसे स्वयं ही भेद पता चल गया.

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संसार में कोई भी घर मृत्यु से अनछुआ नहीं है. इस दुनिया में जीवन से ज़्यादा तो मौतें हुई हैं. स्त्री ने अपने बेटे को दफ़नाया और बुद्ध के पास गई और अपनी भूल स्वीकारी.

बुद्ध के जीवन से कई कहानियां हैं. हमें उन्हें यथासंभव जीवन में उतारना चाहिए. बुद्ध को किसी धर्म से जोड़कर देखने से ज़्यादा आसान है, उनकी बातों को ख़ुद आज़मा कर देखना. दुनिया में फ़ैल रही अशांति को समाप्त करने के लिए, शांति को समर्पित है ये लेख.