एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता और भारत का राष्ट्रगान लिखने वाले रवीन्द्र नाथ टैगोर की आज जयंती है. आज ही के दिन यानि 7 मई को 1861 में उनका जन्म हुआ था. उन्होंने प्रेम पर आधारित कई कवितायें और कहानियां लिखीं हैं, लेकिन आज हम आपको बतायेंगे टैगोर के एक ऐसे 'प्रेम' के बारे में, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे.

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ये कोई साधारण 'प्रेम' नहीं, बल्कि 'Platonic Love' था, सरल शब्दों में इसे 'अफ़लातूनी प्यार' भी कहते हैं. इसका मतलब होता है आध्यात्मिक प्रेम. वैसे तो इस प्रेम को परिभाषित कर पाना मुश्किल है, लेकिन इसका मतलब ऐसा प्रेम है, जिसमें निःस्वार्थ श्रद्धा और अटूट विश्वास हो न कि सिर्फ़ आकर्षण. इसका नाम यूनानी दार्शनिक प्लेटो के नाम पर पड़ा.

ऐसा ही Platonic Love हुआ गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर को अर्जेंटीना की विक्टोरिया ओकैम्पो से.

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1913 में नोबेल पुरुस्कार मिलने के बाद टैगोर दुनिया भर में मशहूर हो गए. उनकी कविताओं का लगभग हर विदेशी भाषा में अनुवाद हुआ. उनको विदेशों के तमाम कार्यक्रमों के लिए बुलावे आने लगे. इसी दौर में उनका यह प्रेम अस्तित्व में आया.

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बात 1914 की है. अर्जेंटीना में एक लड़की ने फ्रेंच में 'गीतांजलि' पढ़ी. वो टैगोर की कविताओं की दीवानी हो गयी. यह लड़की थी विक्टोरिया ओकैम्पो. 25 साल की ओकैम्पो उस वक़्त कोई साधारण लड़की नहीं, बल्कि एक मशहूर फ़ेमिनिस्ट राइटर थीं. वह पहली महिला थीं, जिन्हें अर्जेंटीना एकेडमी ऑफ़ लेटर्स की सदस्य भी बनाया गया.

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1924 में टैगोर जब पेरू यात्रा पर थे, उसी दौरान वो बीमार पड़े, जिस कारण उन्हें ब्यूनस आयर्स में रुकना पड़ा. यहीं पर उन दोनों की पहली मुलाक़ात हुई. 25 साल की ओकैम्पो कई भाषाओं की जानकर थीं. उनकी बुद्धिमानी से प्रभावित टैगोर ने उन्हें अपना प्रेरणा स्रोत माना और बाद में उन्होंने ओकैम्पो को समर्पित कवितायें भी लिखीं जो 'पूर्वी' नाम से प्रकाशित हुई हैं.

उनके द्वारा बांग्ला में लिखी एक कविता, जिसका अनुवाद प्रयाग शुक्ल ने किया है.

चीन्हूँ मैं चीन्हूँ तुम्हें ओ, विदेशिनी!

ओ, निवासिनी सिंधु पार की,

देखा है मैंने तुम्हें देखा, शरत प्रात में, माधवी रात में,

खींची है हृदय में मैंने रेखा, विदेशिनी!

सुने हैं,सुने हैं तेरे गान, नभ से लगाए हुए कान,

सौंपे हैं तुम्हें ये प्राण, विदेशिनी!

घूमा भुवन भर, आया नए देश,

मिला तेरे द्वार का सहारा विदेशिनी!

अतिथि हूँ अतिथि, मैं तुम्हारा विदेशिनी!

टैगोर की ओकैम्पो से दूसरी और अंतिम मुलाक़ात 1930 में हुई. मगर उन दोनों में पत्र व्यव्हार टैगोर की मौत तक चलता रहा. टैगोर अपने पत्रों में उन्हें 'विजोया' बुलाते थे. टैगोर और 'विजोया' के बीच लिखे गए पत्र उनके प्रगाढ़ रिश्ते और बौद्धिक प्रेम की कहानी बयान करते हैं.

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अर्जेंटीना और भारत की दो महान विभूतियों के इस अद्भुत प्रेम को एक फ़िल्म के माध्यम से भी सामने लाया गया है. 'थिंकिंग ऑफ़ हिम' नाम की यह फ़िल्म भारत में ही बनाई गयी है. ये प्रेम कहानी अपने समय के दो महान विचारकों की ही कहानी नहीं है, बल्कि ये दो देशों की संस्कृति और आध्यात्मिक विचारों के मिलन की भी कहानी है, जिसमें प्रेम शारीरिक आकर्षण से बहुत दूर, एक शुद्ध आध्यात्मिक एहसास बन गया है.