आपने अपने घरों की दीवारों और सीलिंग पर मकड़ी का जाल तो देखा ही होगा. अक्सर घरवालें इन्हें साफ़ करने की ड्यूटी भी लगा देते हैं. मगर बार-बार ये जाले फिर से बन जाते हैं. कई बार तो ये हमारे हाथ-मुंह पर चिपक भी जाते हैं. मगर इस दौरान आपने कभी सोचा है कि आख़िर मकड़ी अपना जाल कैसे बनाती है और उसके पास ये जाल आता कहां से है? What are spider webs made of?

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मकड़ी के पास जाल कहां से आता है?

मकड़ी अपना जाल बुनने के लिए एक विशेष प्रकार का रेशमी धागा अपने शरीर से निकालती है, जिसे Spider Silk कहते हैं. ये रेशमी जैसा धागा प्रोटीन से बना होता है.

What are spider webs made of?

Spider Silk का निमार्ण मकड़ी के रेशम ग्रंथियों में होता है. मकड़ी वर्ग में सात प्रकार की रेशम ग्रंथिया होती है. सभी सामान्य मकड़ियों में कम से कम तीन प्रकार की ग्रंथिया तो होती ही हैं.

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ख़ास बात ये है कि सभी प्रकार की ग्रंथि में डिफ़रेंट रेशम होता है. कुछ ग्रंथियों से तरल रेशम निकलता है. ये जैसे ही मकड़ी के शरीर से बाहर निकल कर हवा के संपर्क में आता है तो सूख जाता है.

बता दें, Spider Silk पानी में नहीं घुलता है और ज्ञात प्राकृतिक रेशों में ये सर्वाधिक मजबूत होता है. कुछ मकड़ियों का जाल तो इतना मज़बूत होता है कि उसमें पक्षी तक फंस जाते हैं. मछली पकड़ने के लिए भी लोग ऐसे जालों का इस्तेमाल करते हैं.

कैसे बनाती है मकड़ी अपना जाल?

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मकड़ियों के पेट पर स्पिनरेट नामक संरचनाएं होती हैं जो रेशा ही बुनती हैं. ये हाथ की उंगलियों के जैसे काम करते हैं. अलग-अलग प्रजातियों में अलग-अलग संख्या में स्पिनरेट होते हैं, लेकिन अधिकांश में एक क्लस्टर होता है.

मकड़ी स्पिनरेट को अंदर-बाहर खींच सकती है. यहां तक कि सभी स्पिनरेटों को एक साथ बाहर ठेल भी सकती है. मकड़ियां अलग-अलग स्पिनरेटों की सहायता से विभिन्न रेशम ग्रंथियों से निकले रेशम को मिलाकर मकड़जाल बनाती हैं. मकड़ी अपने पैरों से इसे बाहर खींचती है और साइकिल के पहियों की तीलियों जैसा फ़्रेम तैयार करती है. फिर उसी पर गोल-गोल घूमकर जाल बना लेती है.

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मकड़ी के अंदर ये रेशम तरल रूप में ही होता है. बाहर हवा के संपर्क में आने के बाद ये सूखकर धागे सा बन जाता है. साथ ही, स्पिनरेट से बाहर निकलने से पहले ये तरल एक छलनी जैसी संरचना से गुज़रता है, जिसे क्रिबेलम कहा जाता है.

मकड़ी जाल बनाती क्यों है?

मकड़ी जाल कीड़े-मकौड़ों को फंसाने के लिए बनाती है. कोई भी कीड़ा-मकौड़ा जब जाल के नज़दीक आता है तो वो चिपक जाता है. जब शिकार जाल में फंसता है तो मकड़ी उस पर हमला कर देती है और खा जाती है. बता दें, जाल पर हलका सा कंपन भी मकड़ी को शिकार के फंसने का एहसास करा देता है. इसके अलावा, मकड़जाल का इस्तेमाल रहने और आने-जाने के लिए भी करती है.