प्यार और समर्पण की मिसाल सैनिकों की खान धनूरी गांव में रहने वाली सबसे उम्रदराज़ 103 वर्षीय वीरांगना सायरा बानो ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. उन्हें उनके पैतृक गांव धनूरी में सुर्पुद-ए-ख़ाक़ किया गया. सायरा बानो वो वीरांगना थीं, जिन्होंने अपने हाथ की मेहंदी का रंग फीका पड़ने का भी इंतज़ार नहीं किया और अपने शौहर को देश की सेवा के लिए भेज दिया. उनके शौहर द्वितीय विश्व युद्ध में शहीद हो गए थे. तब से लेकर आजतक यानि अपनी ज़िंदगी के 90 साल अपने शौहर की याद में बिता दिए.

ेोगीो वोलह
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शौहर का चेहरा भी नहीं देखा था

Saira
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103 साल में भी वो एकदम स्वस्थ थीं. उनके ख़ून में देश की सेवा करने का जज़्बा था क्योंकि वो जिस गांव से थीं उस गांव में हर घर में एक व्यक्ति फ़ौज में ज़रूर है. इसलिए इस गांव को फ़ौजियों की ख़ान कहा जाता है. इसी गांव के रहने वाले ताज मोहम्मद ख़ां से 1939 में सायरा बानो का निकाह हुआ था, तब वो महज़ 13 वर्ष की थीं. शादी से पहले ही ताज़ मोहम्मद ख़ां फ़ौज में भर्ती हो चुके थे. इसलिए जैसे ही बारात उनके घर धनूरी वापस आई उन्हें तार मिला कि यूनिट में तुरंत पहुंचना. नई-नवेली दुल्हन बनीं सायरा ने अपने शौहर का चेहरा भी नहीं देखा और वो देश की सेवा के लिए चले गए.

कैप, वर्दी और बेल्ट के सहारे काट दिया जीवन

Saira Bano
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वीरांगना वो इसलिए नहीं कही गईं कि वो देश की सेवा में लगी थीं, बल्कि उन्होंने अपने जीवन के सबसे बड़े दुख का डटकर सामना किया था. जिस युद्ध के लिए उनके शौहर ताज मोहम्मद गए थे उसमें उनके शहीद होने की ख़बर आई, तब तक सायरा बानो के हाथों की मेंहदी का रंग भी फीका नहीं पड़ा था. उन मेंहदी वाले हाथों में उनके पति का हाथ कभी नहीं आया, आई थी बस उनकी कैप, वर्दी और बेल्ट जिसके सहारे सायरा बानो ने अपना पूरा जीवन बिता दिया.

कभी अपना घर नहीं बसाया

saira bano
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उन्हें अपने शौहर की वीरता पर गर्व था, उन्होंने अपना सारा जीवन उनके और उनके परिवार पर वार दिया. कभी अपने बारे में नहीं सोचा. जबतक रहीं बस अपने शौहर के माता-पिता की सेवा करती रहीं और अब उनका इंतज़ार ख़त्म हुआ. हाल ही में वो दुनिया को अलविदा कह उसी दुनिया में चली गईं, जहां उनके शौहर हैं.

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