दिल्ली के नज़ामुद्दीन इलाक़े में स्थित 'हुमायूं का मक़बरा' (Humayun’s Tomb) एक ऐतिहासिक स्मारक है. मुगल वास्तुकला से प्रेरित ये मक़बरा आज दुनियाभर में प्रसिद्ध है. सन 1993 में इस स्मारक को यूनेस्को द्वारा 'विश्व धरोहर स्थल' घोषित किया गया था. 

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इस मक़बरे को हुमायूं की पत्नी हमीदा बानो बेग़म द्वारा सन 1558 में बनवाया गया था. इस मक़बरे के निर्माण में 15 लाख रुपये की लागत आई थी. इसे अफ़गानिस्तान के वास्तुकार मिरक मिर्ज़ा घियास और उनके बेटे ने बनाया था. इसकी मुख्य इमारत लगभग 8 सालों में बनकर तैयार हुई थी. 7 मीटर ऊंचे चबूतरे पर खड़ा ये मक़बरा भारत में मुगल वास्तुकला का प्रथम उदाहरण है.

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इस ख़ूबसूरत क़िला परिसर में हुमायूं की क़ब्र के अलावा उसकी बेग़म हमीदा बानो, मुग़ल सम्राट शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह, मुग़ल सम्राट जहांदर शाह, फर्रुख्शियार, रफ़ी उल-दर्जत, रफ़ी उद-दौलत एवं आलमगीर द्वितीय आदि की कब्रें भी स्थित हैं.  

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16वीं सदी में ये भारतीय उपमहाद्वीप में चारबाग शैली का प्रथम उदाहरण बनी थी. सबसे पहले लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े स्तर पर इस्तेमाल 'हुमायूं का मक़बरा' बनवाने में ही हुआ था. इस मकबरे में वही चारबाग शैली है, जिसने भविष्य में ताजमहल को जन्म दिया. अंतिम मुगल शासक सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र ने सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहां शरण ली थी. 

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आख़िर 100 साल पहले कैसा दिखता था 'हुमायूं का मक़बरा' इन ख़ूबसूरत तस्वीरों के ज़रिए ख़ुद ही देख लाजिये- 

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