अभी तक फ़िल्मों में देखा होगा हीरो को 1 क्या 5-5 गोली लग जाने के बाद भी कुछ नहीं होता वो विलेन को मार कर ही मरता है, लेकिन ऐसा असली में हमारी सरहद पर होता है जहां सैनिक असली गोली खाने के बाद भी भारत माता की रक्षा में बिना डिगे खड़ा रहता है. ऐसे ही एक सैनिक हैं ‘दिगेन्द्र सिंह कोबरा’, जिन्होंने अपने सीने पर 3 गोलीयां खाईं फिर भी हार नहीं मानी और पाकिस्तान के बंकरों को नस्तो-नाबूत करने के बाद ही शहीद हुए.

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13 अगस्त को ‘शेरशाह’ रिलीज़ हुई जिसमें कारगिल वॉर के हीरो कैप्टन बत्रा की कहानी तो आपने देख ली, लेकिन इस वॉर में कई हीरो थे उन्हीं में से एक थे दिगेंद्र कुमार, जो 3 जुलाई 1969 को राजस्थान के सीकर ज़िले में पैदा हुए थे. दिगेंद्र 1985 में राजपूताना राइफ़ल्स 2 में भर्ती हुए. इसके बाद राजपूताना राइफ़ल्स को कारगिल युद्ध का हिस्सा बनने का मौक़ा मिला क्योंकि कारगिल युद्ध में तोलोलिंग पर कब्ज़ा कारगिल युद्ध की दिशा को बदल देता और यहां परर कब्ज़ा करना बड़ा ही मुश्किल था.

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तोलोलिंग पहाड़ी को आज़ाद कराने की रणनीति के बारे में जब जनरल मलिक ने राजपूताना राइफ़ल्स की सेना से पूछा तो, दिगेंद्र ने जवाब में कहा,

मैं दिगेंद्र कुमार उर्फ़ कोबरा बेस्ट कमांडो ऑफ़ इंडियन आर्मी राजपूताना रायफ़ल्स 2 का सिपाही. मेरे पास योजना है, जिसके ज़रिए से हमारी जीत सुनिश्चित है.

-दिगेंद्र कुमार

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हालांकि, तोलोलिंग पर कब्ज़ा पाना आसान नहीं था, क्योंकि पाकिस्तानी सेना ने अपने 11 बंकर ऊपर बना रखे थे और वहां काफ़ी अंधेरा भी था. इसके अलावा पहाड़ियों पर जमी बर्फ़ में शरीर जमा जा रहा था, लेकिन इनके हौंसलों के आगे वो बर्फ़ भी उन्हें जमा नहीं पाई और वो धड़ल्ले से आगे बढ़ते चले गए. जैसे ही वो दुश्मन के बंकर के पास पहुंचे दिगेंद्र ने एक हथगोला बंकर में गिरा दिया, जैसे ही हथगोला बंकर में फटा ज़ोर का धमाका हुआ और आवाज़ आई, अल्हा हो अक़बर, काफ़िर का हमला. दिगेंद्र का पहला वार दुश्मनों पर सही पड़ा था और पहला बंकर राख के ढेर में मिल गया था. इसके बाद दोनों तरफ़ से गोलीबारी तेज़ हो गई.

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आपसी फ़ायरिंग में दिगेंद्र के सीने में तीन गोलियां लगी थीं और वो बुरी तरह से ज़ख़्मी हो चुके थे. उनका एक पैर भी ज़ख़्मी होने की वजह से ख़ून से लथपथ हो गया था और दूसरे पैर का जूता निकल गया था. दिगेंद्र की LMG यानि Light Machine Gun उनके हाथ से छूट गई फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. प्राथमिक उपचार करने के बाद वो फ़ौरन खड़े हुए और 11 बंकरों पर 18 हथगोले फेंक कर उन्हें ख़त्म कर दिया. 

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बंकरों को ख़त्म करने के बाद दिगेंद्र की नज़र पाकिस्तानी मेजर अनवर ख़ान पर पड़ी और उन्होंने उसे धर दबोचा और उसकी सांसों को छीन कर अपनी जीत सुनिश्चित कर ली. इसके बाद दिगेंद्र लड़खड़ाते हुए ज़ख़्मी शरीर से पहाड़ी की चोटी पर पहुंचे और 13 जुलाई 1999 को सुबह 4 बजे तिरंगा लहरा दिया. उस समय की सरकार ने दिगेंद्र कुमार के इस अदम्य और अतुल्य साहस के लिए महावीरचक्र से सम्मानित किया.

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सरहद पर बैठा हर एक सैनिक हाथों में बंदूक लिए भारत माता की रक्षा कर रहा है. अपने परिवारों को छोड़कर हमारे परिवारों की रक्षा कर रहा है. इनके इस निस्वार्थ सेवाभाव और पराक्रम को हम सब तहे दिल से सलाम करते हैं.