सन 1857 में मंगल पांडे ने 'स्वाधीनता आंदोलन' की शुरुआत की थी. 25 मई,1857 को मंगल पांडे की बंदूक से निकली एक गोली ने ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह का आगाज़ किया था. इस विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है और मंगल पांडे को प्रथम क्रांतिकारी, लेकिन '1857 की क्रांति' से लगभग 80 साल पहले ही बिहार के जंगलों से ब्रिटिश हुकुमत के ख़िलाफ़ जंग छिड़ चुकी थी.

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इस जंग की चिंगारी फूंकने वाले आदिवासी नायक थे तिलका मांझी. असल मायनों में 'तिलका मांझी' उर्फ़ 'ज़बरा पहाड़िया' ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पहले क्रांतिकारी और शहीद होने वाले वाले आंदोलनकारी भी थे. 13 जनवरी 1785 को अंग्रेज़ों द्वारा उन्हें सरेआम बरगद के पेड़ पर लटका कर मार दिया गया था.

कौन थे तिलका मांझी 

तिलका मांझी का जन्म 11 फ़रवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज में स्थित 'तिलकपुर' नामक गांव में हुआ था. वो आधुनिक भारत के पहले शहीद आंदोलनकारी थे. इनका वास्तविक नाम 'ज़बरा पहाड़िया' ही था. तिलका मांझी नाम तो उन्हें ब्रिटिश सरकार ने दिया था. आदिवासियों की पहाड़िया भाषा में 'तिलका' का अर्थ है गुस्सैल और पहाड़िया समुदाय में ग्राम प्रधान को 'मांझी' कहकर पुकारने की प्रथा है. 'ज़बरा पहाड़िया' अपने गांव के प्रधान भी थे इसलिए अंग्रज़ों ने उन्हें 'तिलका माझी' नाम दिया था. हालांकि, ब्रिटिशकालीन दस्तावेज़ों में भी उनका असली नाम 'ज़बरा पहाड़िया' ही मौजूद है.  

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'ज़बरा पहाड़िया' क्यों बने 'तिलका माझी'?

'ज़बरा पहाड़िया' आदिवासी समुदाय के लीडर थे. सन 1770 से 1785 के बीच अंग्रेज़ों ने ग़रीब आदिवासियों की घर ज़मीन, खेती और जंगल पर कब्ज़ा करना शुरू लिया था, लेकिन जब ज़बरा ने अपने लोगों पर अत्याचार होते और अपने जंगलो को लूटते हुए देखा था तो उन्होंने अपने समुदाय को एकत्र कर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर दी. अक्सर आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की अंग्रेज़ी सत्ता से लड़ाई रहती थी. इसके बाद युवा 'ज़बरा पहाड़िया' ने इन सभी का लीडर बनकर अन्याय और गुलामी के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. यहीं से वो अंग्रेज़ों की नज़रों में 'ज़बरा पहाड़िया' से 'तिलका माझी' बन गये.

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इसके बाद तिलका मांझी ने स्थानीय लोगों में 'राष्ट्रीय भावना' जगाने के मकसद से भागलपुर में सभाओं को संबोधित करना शुरू किया. इस दौरान उन्होंने जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगों को देश के लिए एकजुट होने के लिए प्रेरित करने का काम किया. सन 1770 में जब भीषण अकाल पड़ा, तो तिलका ने अंग्रेज़ी शासन का खज़ाना लूटकर ग़रीबों में बांट दिया. तिलका के इन नेक कार्यों और विद्रोह की ज्वाला से और भी आदिवासी उनसे जुड़ने लगे. यहीं से शुरू 'संथाल हुल' यानी 'आदिवासियों का विद्रोह' हुआ था. 

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'आदिवासी विद्रोह' या 'संथाल विद्रोह' के दौरान तिलका मांझी ने अंग्रेज़ों और उनके चापलूस सामंतो पर लगातार हमले शुरू कर दिए. उन्होंने स्थानीय सूदखोर जमींदारों एवं अंग्रेज़ी शासकों को जीते जी कभी चैन की नींद सोने नहीं दिया. इस दौरान हर बार तिलका की जीत हुई. साल 1771 से 1784 तक जंगल के इस योद्धा ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया. इस दौरान वो न कभी झुके और न ही अंग्रेज़ों से डरे.  

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सन 1784 में तिलका ने भागलपुर पर हमला किया. इस दौरान उन्होंने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज़ कलेक्टर 'अगस्टस क्लीवलैंड' को अपने ज़हरीले तीर का निशाना बनाया और मार गिराया. कलेक्टर की मौत से पूरी ब्रिटिश सरकार सदमे में थी. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जंगलों में रहने वाला कोई आम-सा आदिवासी ऐसी हिम्मत कर सकता है. 

इसके बाद अंग्रेज़ी सेना ने तिलका माझी को पकड़ने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा लिया, लेकिन वो तिलका को पकड़ ही नहीं पाए. ऐसे में अंग्रेज़ों ने अपनी पुरानी नीति 'फूट डालो और राज करो' अपनाई. इस दौरान ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके समुदाय के लोगों को भड़काना और ललच देना शुरू कर दिया. अंग्रेज़ों की ये रंग लाई और आदिवासी समुदाय से ही एक गद्दार ने तिलका के बारे में अंग्रेज़ों को सूचना दे दी.  

सूचना मिलते ही रात के अंधेरे में अंग्रेज़ सेनापति आयरकूट ने तिलका के ठिकाने पर हमला कर दिया, लेकिन वो किसी तरह वहां वे बच निकले और उन्होंने पहाड़ियों में शरण लेकर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ छापेमारी जारी रखी. ऐसे में अंग्रेज़ों ने पहाड़ों की घेराबंदी करके उन तक पहुंचने वाली तमाम सहायता रोक दी. अब तिलका मांझी को बिना अन्न और पानी के पहाड़ों से निकल कर अंग्रेज़ों से लड़ना पड़ता था, लेकिन एक दिन वो लड़ते-लड़ते अंग्रेज़ों की पकड़ में आ गए.  

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कहा जाता है कि तिलका मांझी को अंग्रेज़ 4 घोड़ों से घसीट कर भागलपुर ले गए थे. इसके बाद 13 जनवरी 1785 को उन्हें एक बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई थी. जिस समय 'तिलका मांझी' ने देश की ख़ातिर अपने प्राणों की आहुति दी, उस समय देश के पहले स्वाधीनता संग्राम का बिगुल फूकने वाले मंगल पांडे का जन्म भी नहीं हुआ था. 

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ब्रिटिश सरकार को लगा था कि तिलका माझी का ऐसा हाल देखकर कोई भी भारतीय फिर से उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश नहीं करेगा, लेकिन उन्हें क्या पता था बिहार के पहाड़ों और जंगलों से शुरू हुआ ये संग्राम एक दिन ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ कर ही थमेगा. तिलका के बाद भी न जाने कितने क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते भारत मां के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी.  

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भारतीय इतिहास के पन्नो में भले ही मंगल पांडे पहले आंदोलनकारी हों, लेकिन तिलका मांझी के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता है. देश के कई बड़े लेखकों ने अपनी किताबों में तिलका मांझी को 'प्रथम स्वतंत्रता सेनानी' होने का सम्मान दिया है. महान लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका मांझी के जीवन और विद्रोह पर बांग्ला भाषा में एक ‘शालगिरर डाके’ उपन्यास लिख चुकी हैं. इसके अलावा हिंदी मशहूर उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने अपने 'हुल पहाड़िया' उपन्यास में तिलका मांझी के संघर्ष को बताया है.