भारत हमेशा से ही विश्व के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है. यही वजह है कि यहां समय-समय पर विदेशी आक्रमण होते रहे हैं. लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि यहां आक्रमण करने वाले विदेशी आक्रांताओं को धूल चटाने वाले कई वीर योद्धा भी हुए. भारत भूमि वीरों की गाथाओं से भरी पड़ी है. इनमें बहुत से वीरों का नाम आज भी लिया जाता है, जबकि कुछ वीरों की गाथाएं अनसुनी रही हैं. इस लेख के ज़रिेए हम भारत के एक ऐसे ही वीर योद्धा के बारे में आपको बताने जा रहे हैं जिसकी बहादुरी देख खिलजी दुम दबाकर भाग गया था.   

राजा कान्हड़देव 

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कहा जाता है कि 12वीं शताब्दी में तुर्की आक्रांता भारत पर आक्रमण करने लगे थे. उस समय जालौर (राजस्थान) में महाराजा सामंत सिंह का राज था. उन्हीं के बेटे थे कान्हड़देव. कहते हैं कि बचपन से ही कान्हड़देव की वीरता के लक्षण दिखने लग गए थे. बाद में कान्हड़देव जालौर के राजा बने. जल्द ही उन्होंने अपने कुशल नेतृत्व से राज्य की सीमा का विस्तार किया.   

अल्लाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

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कहते हैं कि 1298 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने गुजरात पर आक्रमण कर दिया था. खिलजी की सेना लूटपाट और मारकाट करती हुई आगे बढ़ रही थी. इसी बीच इस शासक की सेना ने प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर और अन्य मंदिरों में लूटपाट भी की और मंदिरों को नष्ट किया. गुजरात फ़तह करने के बाद खिजली की सेना 1299 में राजस्थान में दाखिल हुई. खिलजी की सेना ने जालौर के नज़दीक छोटे राजाओं को हरा दिया और अब उनकी नज़र जालौर पर थी. 

तोड़ा शिवलिंग और बनाया महिलाओं को बंदी

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खिलजी ने जालौर में आकर महादेव का शिवलिंग तोड़ दिया और कई औरतों और बच्चों को बंदी बना लिया. राजा कान्हड़देव को जब इस बात का पता चला, तो उन्होंने प्रण लिया कि वो खिलजी की क़ैद से लोगों को आज़ाद कराएंगे. साथ ही मंदिरों का निर्माण फिर से कराएंगे.   

खिलजी की सेना से लड़ाई

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राजा कान्हड़देव ने खिलजी की सेना से लड़ने के लिए अपनी सेना तैयार की. ख़ास रणनीति के तहत सेना को दो भागों में बांटा गया. राजा कान्हड़देव अपनी सेना को लेकर 9 कोस दूर साकरना गांव पहुंच गए और सुबह होते ही खिलजी पर हमला बोल दिया. कहते हैं कि खिलजी की सेना राजा कान्हड़देव की सेना से 10 गुना बड़ी थी. यह हमला इतना अचानक हुआ की तुर्क शासक की सेना समझ नहीं पाई और मैदान छोड़कर भाग गई. कहते हैं कि इस लड़ाई में खिलजी का भतीजा मारा गया था.   

किया अपना वचन पूरा

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राजा कान्हड़देव ने बंदी बनाई गई औरतों को बच्चों को रिहा करवाया और लूटी गई मूर्तियों को मंदिर में स्थापित करवाया. इस तरह राजा कान्हड़देव ने अपना वचन पूरा किया.  

खिलजी का दूसरा आक्रमण  

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कहते हैं कि राजा कान्हड़देव के बेटे (वीरमदेव) की सुंदरता और वीरता को सुन अल्लाउद्दीन खिलजी की बेटी काफ़ी प्रभावित हुई थी. वहीं, बेटी की ज़िद पर खिलजी ने वीरमदेव से अपने बेटी के निकाह का प्रस्ताव राजा कान्हड़देव के पास भिजवाया. लेकिन, राजा कान्हड़देव ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया. यह देख खिलजी बहुत ही क्रोधित हुआ और उसने अपने सेनापति नहर मलिक को जालौर पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया. लेकिन, इस बार भी उसे मुंह की खानी पड़ी.  

वीरगति को हुए प्राप्त  

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बार-बार मुंह की खाने के बाद खिलजी ख़ुद एक विशाल सेना लेकर जालौर पर आक्रमण करने के लिए पहुंचा. खिलजी संग युद्ध कई महीनों तक चलता रहा और राजपूत योद्धा आख़िरी सांस तक लड़ते रहे. राजा कान्हड़देव ने खिलजी के कई योद्धाओं को मारा. लेकिन, इस युद्ध में वो वीरगति को प्राप्त हो गए. युद्ध का सारा भार बेटे पर आ गया. खिलजी के सेनापति ने राजकुमार के सामने निकाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने फिर मना कर दिया. काफ़ी दिनों तक चले इस युद्ध में राजकुमार वीरमदेव भी वीरगति को प्राप्त हो गए.