उत्‍तर प्रदेश के गोरखपुर से क़रीब 30 किलोमीटर दूर है एक क़स्‍बा चौरीचौरा. ये वही जगह है जिसने 'स्‍वतंत्रता संग्राम' में अहम भूमिका निभाई थी. इस क़स्बे में हुए 'चौरीचौरा कांड' ने अंग्रेज़ों की चूलें हिला दी थी. आज इस क़स्बे का ज़िक्र 'चौरीचौरा कांड' के लिए नहीं, बल्‍कि यहां के मीठाबेल गांव निवासी रिटायर्ड कैप्‍टन आद्या प्रसाद दूबे को लेकर हो रहा है. 

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चलिए जानते हैं आख़िर कैप्‍टन आद्या प्रसाद दूबे हैं कौन?

एक सैनिक ताउम्र सैनिक ही रहता है, चाहे वो सर्विस हो या रिटायर हो गया हो... ये कहावत भारतीय सेना के रिटायर्ड कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे पर फ़िट बैठती है. गोरखपुर के मीठाबेल गांव निवासी ये रिटायर्ड फ़ौजी आज एक मिसाल पेश कर चुके हैं. सन 1964 में टेक्नीशियन के रूप में भारतीय सेना में भर्ती होने वाले कैप्टन दुबे ने साल 1992 में सेना से रिटायर होने के बाद घर बैठने के बजाय युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित करने का काम किया.

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73 वर्षीय रिटायर्ड कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे ने साल 1994 में एक फ़्री 'सैनिक करियर सेंटर' की नींव रखी. आज उनके इस ट्रेनिंग सेंटर से आर्मी, नेवी, एनडीए, एयरफ़ोर्स, यूपीपी, पैरामेडिकल व अलग-अलग फ़ोर्सो में 4000 युवकों और 50 से अधिक युवतियों का चयन हो चुका है. वो बगैर किसी सरकारी सहायता के देश की सेवा के लिए युवाओं की फ़ौज़ तैयार कर रहे हैं.

भारतीय सेना के पूर्व कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे ने साल 1994 में जब इस ट्रेनिंग सेंटर की नींव रखी उस वक्त उन्होंने अपनी कोशिशों से गांव के प्राथमिक स्कूल, सहसरांव, चौरीचौरा के बंजर ज़मीन को खेल के मैदान में तब्दील कराने का काम किया ताकि गांव के बच्चे यहां आकर ट्रेनिंग कर सकें. शुरुआत में कैप्टन को ट्रेनिंग सेंटर चलाने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

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आज इस ट्रेनिंग सेंटर में न केवल आस-पास के गांवों के युवा, बल्कि बिहार और झारखंड के भी कई युवा यहां ट्रेनिंग ले रहे हैं. इस ट्रेनिंग सेंटर की वजह से गांव की सूरत ही बदल गई है. दूसरे राज्यों से आने वाले युवाओं की वजह से गांव वालों को घर बैठे ही रोज़गार मिल रह है. कई लोग किराए के मकानों से अपनी जीविका चला पा रहे हैं.

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कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे की मेहनत और लगन के चलते आज आस-पास के गावों के कई युवा भारतीय सेनाओं में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इस समय भी कैप्टन दुबे की पाठशाला में क़रीब 300 से ज्यादा युवक और युवतियां ट्रेनिंग ले रहीं हैं.

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कैप्टन दुबे बताते हैं कि, रिटायरमेंट के बाद मैंने देखा कि गांव के बच्चे ग़लत दिशा में जा रहे हैं. बच्चों के पास अच्छी कदकाठी व डिग्री थी, लेकिन भविष्य के लिए कोई योजना नहीं थी. लिखित परीक्षा की तैयारी करने के लिए गोरखपुर में सैकड़ों कोचिंग सेंटर थे, लेकिन फिजिकल की ट्रेनिंग कोई नहीं देता था. सेना, पुलिस या अर्धसैनिक बलों की भर्ती में अधिकतर बच्चे फिजिकल नहीं निकाल पाते थे, लिहाजा उनके सपने बिखर जाते थे.

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कैप्टन ने आगे बताया, शुरुआत में इस सेंटर पर केवल शारीरिक ट्रेनिंग दी जाती थी, लेकिन बाद में हमने एकेडमिक ट्रेनिंग देनी भी शुरू कर दी. अब यहां हर बुधवार को क्लासेज चलती हैं. जिसमें प्रतियोगी परीक्षा के लिए तैयारी भी कराई जाती है. साथ ही समय-समय पर एग्जाम पैटर्न पर टेस्ट भी लिया जाता है. इसके अलावा स्टूडेट्स को इंग्लिश स्पीकिंग की ट्रेनिंग भी दी जाती है.

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इस ट्रेनिंग सेंटर से निकले कई पुराने छात्र जो आज भारतीय सेनाओं में हैं वो घर आने पर ट्रेनिंग सेंटर आकर कैप्टन को सहयोग भी करते हैं.