आज़ाद हिन्द फ़ौज (Indian National Army) ने देश को अंग्रेज़ों से आज़ाद करवाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इस फ़ौज की कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हाथों में थी. इसके सिपाहियों ने देश को स्वतंत्र करवाने के लिए काफ़ी संघर्ष किया था. इसके लड़ाके अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे. ऐसे ही एक जवान की कहानी आज हम इतिहास के पन्नों से आपके लिए लेकर आए हैं.

हम बात कर रहे हैं आज़ाद हिन्द फ़ौज में कर्नल रहे गुरबख्श सिंह ढिल्लों की जिनपर 'लाल क़िला ट्रायल' नामक ऐतिहासिक मुक़दमा चलाया गया था. इस ट्रायल में INA के तीन जनरल गुरबख्श सिंह ढिल्लों, प्रेम सहगल, और शाहनवाज़ ख़ान का नाम शामिल था. इनके साथ देश के 40 करोड़ लोग खड़े थे. तब नारा भी गूंजा था '40 करोड़ों की आवाज़-सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़.'

बनना चाहते थे डॉक्टर

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गुरबख्श सिंह ढिल्लों का जन्म 1914 में पंजाब के तरणतारण ज़िले में हुआ था. उनके पित एक पशु चिकित्सक थे. गुरबख्श पढ़ने लिखने में तेज़ थे उनका सपना था कि वो डॉक्टर बनें. लेकिन पंजाब यूनिवर्सिटी के डॉक्टरी के एग्ज़ाम में फ़ेल होने के बाद वो निराश हो गए. चूंकि वो पढ़ने में तेज़ थे और उनकी कद-काठी भी ठीक थी तो उनके पिता के एक दोस्त ने गुरबख्श को आर्मी जॉइन करने की सलाह दी. 

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1941 में अंग्रज़ों की तरफ से द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा 

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इसके बाद उन्होंने जमकर तैयारी की और इंडियन आर्मी के लिए 1933 में सेलेक्ट हो गए. इन्हें 14वीं पंजाब रेजिमेंट में सेलेक्ट किया गया था. ट्रेनिंग के बाद 1941 में द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ने के लिए ब्रिटिश सेना ने उन्हें मलेशिया भेज दिया. यहां उन्होंने दुश्मनों को खूब छकाया. लेकिन 1942 में उन्हें जापान की सेना ने युद्ध बंदी बना लिया. यहां की जेल में उनका मन बदला और वो ब्रिटिश सेना के ख़िलाफ लड़ने को तैयार हो गए. 

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'लाल क़िला ट्रायल' 

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यहां से छूटने के बाद उन्होंने सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज को जॉइन कर लिया. यहां गुरबख्श ने कर्नल प्रेम सहगल, और मेजर जनरल शाहनवाज़ ख़ान के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया. मगर दुर्भाग्य से 1945 में ब्रिटिश सेना ने इन्हें और आज़ाद हिंद फ़ौज के दूसरे साथियों के साथ गिरफ़्तार कर लिया.  उन पर ब्रिटिश सम्राट के ख़िलाफ युद्ध करने को लेकर 'लाल क़िला ट्रायल' नामक ऐतिहासिक मुक़दमा चलाया गया. इसमें उनके दो साथी प्रेम सहगल, और मेजर जनरल शाहनवाज़ ख़ान का भी नाम था.

नेहरू जी ने लड़ा केस

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उनकी पैरवी करने वाले वक़ीलों की लिस्ट में नेहरू जी भी शामिल थे. ये केस एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया था. लोगों का आक्रोश खुलकर अंग्रेज़ों के सामने आने लगा. करोड़ों भारतीयों ने आज़ादी और उन सैनिकों को आज़ाद करने के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी. जिसका नतीजा ये रहा कि मजबूर ब्रिटिश सरकार को प्रेम सहगल, शाहनवाज़ ख़ान और गुरबख्श समेत सभी आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों को रिहा करना पड़ा. 

पद्म भूषण से किए गए सम्मानित

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तब तक देश को आज़ाद करने के बारे में अंग्रेज़ सोचने लगे थे और परिणामस्वरूप 1947 में हम स्वतंत्र हो गए. आज़ादी के बाद उन्होंने एक बुक लिखी जिसमें उन्होंने अपने एक्सपीरियंस को बयां किया था. 1998 में भारत सरकार ने गुरबख्श सिंह ढिल्लों को देश सेवा के लिए 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया था. उन्होंने 2006 में अंतिम सांस ली थी.

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इनके जीवन पर आधारित एक फ़िल्म भी बन चुकी है. इसका नाम 'रागदेश' है जिसमें एक्टर अमित साध ने इनका रोल प्ले किया था. 2017 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म को तिग्मांशु धूलिया ने डायरेक्ट किया था.