'कोहिनूर' हीरा एक दौर में हिन्दुस्तान की पहचान हुआ करता था. वर्तमान में 'कोहिनूर' विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध हीरों में गिना जाता है. 19वीं सदी में अंग्रेज़ इसे लूट कर अपने देश ब्रिटेन ले गए. आज यही 'कोहिनूर' ब्रिटेन की महारानियों के ताज पर विराजमान है.  

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'कोहिनूर' हीरे की कहानी बेहद जटिल है. पहले ये भारत के गोलकोंडा से कंधार पहुंचा, फिर भारत वापस आया, इसके बाद अंग्रेज़ इसे ब्रिटेन ले गए. इस अनमोल हीरे की असल कहानी क्या है आइए जानते हैं. 

कोहिनूर हीरे के इसी जटिल इतिहास को समझने के लिए पहले हम 13वीं शताब्दी में चलते हैं.  

बताया जाता है कि क़रीब 793 कैरेट वजन के 'कोहिनूर' हीरे को भारत के 'गोलकोंडा खानों' में तराशा गया था. ये वो दौर था जब वारंगल में 'काकतीय राजवंश' का शासन हुआ करता था. कहा जाता है कि 1310 में 'कोहिनूर' को वारंगल के 'काकतीय मंदिर' में एक देवता की आंख के रूप में इस्तेमाल किया गया था.

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14वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली सल्तनत के 'खिलजी वंश' के द्वितीय शासक अलाउद्दीन खिलजी और उसकी सेना ने दक्षिणी भारत के राज्यों को लूटना शुरू कर दिया. वारंगल पर एक छापे के दौरान मलिक काफूर 'काकतीय शासकों' से इस अनमोल हीरे को छीनकर दिल्ली ले आया. इसके बाद 'कोहिनूर' दिल्ली सल्तनत के सफ़ल राजवंशों की शान बन गया. 

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मुग़ल सम्राट बाबर ने अपनी किताब 'बाबरनामा' में भी इस हीरे का जिक्र में किया है. पानीपत की लड़ाई के बाद ग्वालियर के सम्राट द्वारा हुमायूं को ये हीरा गिफ़्ट किया गया था. बाद में हुमायूं द्वारा इसे बाबर को गिफ़्ट किया गया था और इसे 'बाबर का हीरा' कह कर संबोधित किया जाने लगा. 

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17वीं शताब्दी में शाहजहां द्वारा अपने 'मयूर सिंहासन' पर इस हीरे को जड़ा गया था. अपने इस सफ़र के दौरान कोहिनूर घटते-घटते मात्र 186 कैरेट का ही रह गया था. औरंगज़ेब के पोते 'मोहम्मद शाह' के पास ये हीरा आने के बाद 1740 में ईरान के शासक नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण कर दिया. मोहम्मद शाह से इस हीरे को लूटकर नादिर शाह ने इसे 'कोहिनूर' नाम दिया.

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ईरान के शासक नादिर शाह की हत्या के बाद उनके जनरल 'अहमद शाह दुर्रानी' ने 'कोहिनूर' को अपने कब्ज़े में ले लिया. सन 1813 में अहमद शाह के वंशज 'शाह राजा दुर्रानी' द्वारा इस हीरे को सिख समुदाय के संस्थापक महाराणा 'रंजीत सिंह' को गिफ़्ट कर दिया गया. 'कोहिनूर' के बदले महाराणा रंजीत सिंह ने अफ़गानिस्तान की राजगद्दी वापस पाने के लिए 'शाह शुजा' की मदद की थी.

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इसके बाद सन 1849 में 'एंग्लो सिख युद्ध' में 'ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी' द्वारा इस हीरे पर कब्ज़ा कर लिया गया. सन 1852 ई. में 'कोहिनूर' को चमकदार बनाने का ठेका डच जौहरी मिस्टर 'कैंटॉर' को दिया गया, जिसे बाद में महारानी विक्टोरिया के ताज में जोड़ दिया गया आज तक यही हीरा ब्रिटेन की महारानियों द्वारा ताज के रूप में पहना जाता है. 

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बताया जाता है कि 'कोहिनूर' जड़े ताज को लंदन की 'टेम्स नदी' किनारे बने एक विशाल क़िले में हाई सिक्योरिटी के साथ रखा गया है. भारत सरकार ने अपने इस अनमोल हीरे को वापस लाने की कई कोशिशें की, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने भारत के दावे को मान्यता नहीं दी. भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान भी 'कोहिनूर' को वापस पाने की कई कोशिशें कर चुका है.