अगर आप कभी रामेश्वरम से रामसेतु की ओर गए हों तो रास्ते में आपने कई खंडहर देखे होंगे. तमिलनाडु की धनुषकोडी नाम की ये जगह एक ज़माने में समृद्ध नगर हुआ करता था, लेकिन आज ये भुतहा शहर के नाम से जाना जाता है. इसके भुतहा शहर बनने के पीछे की कहानी बेहद दर्दनाक है.

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बात 66 साल पुरानी है. 15 दिसंबर 1964 को मौसम वैज्ञानिकों ने साउथ अंडमान में बन रहे एक भयंकर तूफ़ान की चेतावनी दी. मौसम वैज्ञानिकों की ये भविष्यवाणी सटीक निकली. इस बीच मौसम ने करवट ली और तेज़ तूफ़ान के साथ बारिश होने लगी. 21 दिसंबर तक इसने विकराल रूप लेना शुरू कर दिया.  

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22 दिसंबर 1964 को श्रीलंका से चक्रवाती तूफ़ान ने क़रीब 110 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से भारत की ओर रुख किया. इस दौरान तूफ़ान तमिलनाडु के 'पांबन आईलैंड' से टकराने के बाद वेस्ट नॉर्थ वेस्ट की ओर 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से बढ़ने लगा. तूफ़ान की रफ़्तार से लोगों के बीच हाहाकार मचने लगा.

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22 दिसंबर की शाम के क़रीब 6 बजे होंगे. पांबन आईलैंड के 'धनुषकोडी रेलवे स्टेशन' के स्टेशन मास्टर सुंदरराज तूफ़ान और बारिश के बीच अपनी ड्यूटी ख़त्म करके घर पहुंच चुके थे. रात के क़रीब 9 बजे पांबन से धनुषकोडी तक चलने वाली पैसेंजर ट्रेन 100 यात्रियों को लेकर 'धनुषकोडी रेलवे स्टेशन' आ रही थी.

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रात के क़रीब 23.55 बजे 'ट्रेन नंबर 653' पांबन स्टेशन से निकलकर धनुषकोडी रेलवे पहुंचने ही वाली थी कि. इस बीच चक्रवाती तूफ़ान ने अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी. तेज़ बारिश और तूफ़ान के कारण सिग्नल में ख़राबी आने के चलते लोको पायलट ने ट्रेन धनुषकोडी स्टेशन से कुछ दूरी पर रोक दी. काफ़ी देर इंतज़ार के बाद जब लोको पायलट को कोई सिग्नल नहीं मिला, तो उन्होंने रिस्क लेने का फ़ैसला किया और तूफ़ान के बीच ट्रेन आगे बढ़ा दी.  

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इस दौरान ट्रेन विशाल समंदर के ऊपर बने 'पांबन ब्रिज' से गुज़र रही थी. ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी साथ ही समंदर की लहरें भी बढ़ रही थीं. इस बीच अचानक लहरें इतनी तेज़ हो गई कि 6 डिब्बों की इस ट्रेन में सवार 100 यात्रियों और 5 रेलवे कर्मचारियों समेत कुल 105 लोग समंदर की गहराईयों में समा गए. कहा तो ये भी जाता है कि मरने वाले यात्रियों की संख्या 180 से 200 के बीच थी, क्योंकि कई लोग बिना टिकिट के भी यात्रा कर रहे थे.

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बताया जाता है कि ये चक्रवाती तूफ़ान भारत में आए अब तक के सबसे ख़तरनाक तूफ़ानों में से एक था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 'धनुषकोडी रेलवे स्टेशन' का नामो निशान ही मिट गया था. इस चक्रवाती तूफ़ान के चलते 1,500 से 2,000 लोगों की जान गई थी. केवल धनुषकोडी में ही 1000 से अधिक लोग मारे गए थे.