सन 1959 तक भारतीय क़ानून व्यवस्था में जूरी सिस्टम की न्यायप्रणाली हुआ करती थी. इस सिस्टम के तहत 'निचली अदालतों' में समय समय पर ज़िले के वोटर सूची से 9 नागरिकों को चुना जाता था. इन चुने हुए लोगों को 'जूरी सदस्य' बोला जाता था. ये सदस्य हर मामले के बाद क्रमवार तरीक़े से बदले जाते थे. इस दौरान जज ही तय करता था कि किस धारा के अंतर्गत आरोपी पर मामला दर्ज होगा और जूरी को कौन से सबूत दिखाए जायें व कौन से नहीं. 

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इस दौरान जूरी को सिर्फ़ दिखाए गए सबूतों और दर्ज किये मामलों की धारा के अंतर्गत दोषी या निर्दोष बोलना होता था. उस समय इस कमजोर जूरी सिस्टम में सभी अधिकार जज के पास ही हुआ करते थे, न कि जूरी के पास. लेकिन 'जूरी सिस्टम' कमज़ोर होने के बावजूद देश और समाज के लिए काफ़ी लाभदायक भी हुआ करती थी. 'जूरी सिस्टम' के चलते सजा के डर से उस समय लोग सतर्क करते थे और कोर्ट-कचहरी में भी रिश्वतखोरी कम ही होती थी. 

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प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में एक साजिश के अंतर्गत 'नानावटी केस' का बहाना बनाकर ये प्रणाली समाप्त कर दी गई थी. सन 1959 में K. M. Nanavati vs State of Maharashtra केस काफ़ी सुर्ख़ियों में आया था. इस दौरान भारतीय नौसेना के कमांडर कावास मानेकशॉ नानावटी पर उनकी पत्नी के प्रेमी प्रेम आहूजा की हत्या का मुकदमा चलाया गया था.

क्या था नानावटी केस? 

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भारतीय नौसेना के कमांडर के. एम. नानावटी ने अपनी पत्नी सिल्विया नानावटी के प्रेमी प्रेम आहूजा की अवैध संबंध के चलते अपनी लाइसेंसी पिस्टल से गोली मारकर जान ले ली थी. इस बाद नानावटी आत्म-समर्पण कर लिया था. धारा 302 के तहत आरोपी कमांडर नानावटी को निचली कोर्ट में पेश किया गया. इस दौरान जूरी ने शुरुआत में उन्हें दोषी मानने से इंकार कर दिया, लेकिन 'बॉम्बे हाई कोर्ट' ने जूरी के इस फ़ैसले को ख़ारिज़ कर मामले को 'बेंच ट्रायल' के रूप में फिर से आजमाया. अंततः कमांडर नानावटी को महाराष्ट्र की नवनियुक्त राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित द्वारा क्षमा कर दिया गया था.  

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हालांकि, ये केस भारत में अंतिम जूरी ट्रायल नहीं था, जैसा कि कहा जाता है. नानावटी मामले में काफ़ी राजनैतिक प्रभाव था. कहा जाता है कि इस मामले को ग़लत तरीके से मीडिया में पेश करके सन 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु के प्रभाव और भ्रष्ट जज की वजह समाप्त कर दिया गया था.

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कौन था प्रेम आहूजा? 

प्रेम आहूजा पेशे से बिज़नेसमैन और कमांडर नानावटी का दोस्त भी था. नानावटी की अनुपस्थिति में प्रेम आहूजा उनकी पत्नी सिल्विया नानावटी के के करीब आ गया और उनकी प्रेम कहानी शुरू हो गई. कमांडर के. एम. नानावटी को जब इन दोनों की प्रेम कहानी के बारे में पता चला तो एक दोस्त होने के नाते वो प्रेम आहूजा से सिल्विया से शादी करने की अपील लेकर उसके घर गए, लेकिन प्रेम आहूजा शादी से इंकार कर दिया और सिल्विया के कैरेक्टर पर ही सवाल उठा दिए. इस लिए गुस्से में आकर कमांडर नानावटी ने प्रेम आहूजा का क़त्ल कर दिया.  

प्रेम आहूजा का परिवार भी बेहद पावरफ़ुल था. इस मामले में उनके परिवार ने जज आदि से सेटिंग कर नानावटी पर पूर्व-द्वेष के साथ अहुजा को मारने का आरोप लगाया था. ये बात स्पष्ट थी कि नानावटी ने ही आहूजा को मारा है क्योंकि उन्होंने स्वयं आत्म-समर्पण किया था. इस दौरान वकीलों और जज ने नानावटी के ख़िलाफ़ कम अपराध वाली धाराओं के बजाय सीधे 302 धारा के तहत मुक़दमा चलाया था. आहूजा के परिवार वाले चाहते थे कि नानावती को अधिक से अधिक सजा हो, इसलिए उन्होंने जज आदि पर प्रभाव डालने की कोशिश भी की थी. 

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प्रेम आहूजा का परिवार भी बेहद पावरफ़ुल था. इस मामले में उनके परिवार ने जज आदि से सेटिंग कर नानावटी पर पूर्व-द्वेष के साथ अहुजा को मारने का आरोप लगाया था. ये बात स्पष्ट थी कि नानावटी ने ही आहूजा को मारा है क्योंकि उन्होंने स्वयं आत्म-समर्पण किया था. इस दौरान वकीलों और जज ने नानावटी के ख़िलाफ़ कम अपराध वाली धाराओं के बजाय सीधे 302 धारा के तहत मुक़दमा चलाया था. आहूजा के परिवार वाले चाहते थे कि नानावती को अधिक से अधिक सजा हो, इसलिए उन्होंने जज आदि पर प्रभाव डालने की कोशिश भी की थी. 

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इस मामले में प्रेम आहूजा के वकील ये पूरी तरह से साबित न कर सके कि नानावटी ने पूर्व-द्वेष से आहूजा को मारा है. इसीलिए जूरी ने संदेह का लाभ देते हुए नानावटी को छोड़ दिया और 302 धारा का दोषी भी नहीं माना. इस दौरान मीडिया ने भी इस मामले को नहीं उठाया कि जूरी ने 302 के अंतर्गत नानावटी को निर्दोष माना है. इससे ये स्पष्ट होता है कि मीडिया को भी जूरी के पक्ष में नहीं बोलने के लिए प्रभावित किया गया था. 

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कहा जाता है कि इस मामले में प्रधानमंत्री नेहरू के प्रभाव के चलते ही नानावटी को क्लीन चिट मिली थी. इस मामले में किसी भी जज ने आपत्ति तक नहीं उठाई क्योंकि जूरी के समाप्त किये जाने से भ्रष्ट जज, नेताओं से प्रसन्न थे. इस दौरान भ्रष्ट जजों और नेताओं ने जज आदि का दोष छुपाने के लिए उलटा जूरी पर ही बिना कोई प्रमाण दिए इल्जाम लगा दिया गया. दरअसल, उस दौर में 'जूरी' ने भ्रष्ट जजों और राजनेताओं के काले धंधों को रोकने का काम किया था.

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बता दें कि भारत में जूरी परीक्षण 1973 तक होते रहे. लेकिन 'नानावटी केस' की वजह से ही सन 1958 में 'लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया' द्वारा अपनी 14वीं रिपोर्ट में 'जूरी सिस्टम' को समाप्त करने की सिफ़ारिश की गई थी. अंततः '1973 कोर्ट ऑफ़ क्रिमिनल' के तहत इसे समाप्त कर दिया गया.

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'जूरी सिस्टम' के तहत जज के बदले 15 से 1500 नागरिक जिन्हें 'जूरी सदस्य' कहा जाता था, वो फ़ैसला लिया करते थे. ये 15 से 1500 नागरिक लाखों की मतदाता सूची में से लॉटरी से क्रम-रहित तरीके से चुने जाते थे और हर मामले में नए जूरी सदस्य फ़ैसला करते थे. जूरी सिस्टम में जज सिस्टम की तुलना में, सेटिंग करना बहुत कठिन होता होता था, इसीलिए कोर्ट मामलों का फ़ैसला 'जूरी सिस्टम' में जल्दी और न्यायपूर्वक आता था. जूरी सिस्टम में फ़ैसले कुछ ही हफ़्तों में आ जाते हैं सालों साल नहीं लगते थे. 'जज सिस्टम' की तुलना में 'जूरी सिस्टम' में सेटिंग करना बेहद मुश्किल होता था.  

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अगर आज देश में फिर से 'जज सिस्टम' के बदले 'जूरी सिस्टम' लागू होता है तो 5-6 जज के बदले 1500 व्यक्ति उन 100 कोर्ट मामलों का फ़ैसला करेंगे. ये जूरी सदस्य कम से कम 10 सालों तक दोहराए नहीं जा सकते. जूरी मंडल सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक एक ही मामले को सुनेंगे. ऐसे में अपराधी को अंतिम क्षण तक ये नहीं मालूम होगा कि कौन से लोग निर्णय करने के लिए चुने जायेंगे. किसी तरह उसे पता भी चल जाये, तो जूरी सदस्य और अपराधी के बीच में सेटिंग करना बेहद कठिन है.