आनंद बख़्शी! 60 से लेकर 90 के दशक तक अपने ख़ूबसूरत गीतों से लोगों के दिलों पर राज करने वाले इस महान गीतकार को भला कौन नहीं जनता है. ‘ज़िंदगी के सफ़र में’, ‘प्यार दीवाना होता है’, ‘ये ज़मीं गए रही है’, ‘दो दिल मिल रहे हैं’, ‘चिट्ठी न कोई संदेश’, ‘कहीं आग लगे लग जाए’ जैसे बेहतरीन गाने लिखने वाले आनंद बक्शी आज भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनके नगमे हमें यूं हीं गुनगुनाने पर मज़बूर कर देते हैं. 

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आनंद बख़्शी (Anand Bakshi) ने वैसे तो बॉलीवुड फ़िल्मों के लिए हज़ारों गाने लिखे, लेकिन उनके कुछ गाने ऐसे भी थे जो ऑल टाइम सुपरहिट बन गये. हिंदी सिनेमा में आज गीत-संगीत अपने सबसे ख़राब दौर में है, लेकिन एक दौर था जब आनंद बक्शी के गाने बॉलीवुड फ़िल्मों की जान हुआ करते थे और सुनने वालों की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते थे. यही वजह है कि अपने ख़ूबसूरत गीतों के लिए सैकड़ों पुरस्कार और ट्रॉफी जीतने वाले गीतकार आनंद बख़्शी के जीवन में अपने पास आई एक चिट्ठी बेहद कीमती थी. 

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साल 1974 में निर्देशक दुलाल गुहा की फ़िल्म ‘दोस्त’ रिलीज़ हुई थी. इस फ़िल्म में धर्मेंद्र, हेमा मालिनी और शत्रुघ्न सिन्हा मुख्य किरदारों में नज़र आये थे. इसके अलावा अमिताभ बच्चन ने भी फ़िल्म में एक छोटी-सी गेस्ट भूमिका निभाई थी. इस फ़िल्म में ‘गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है’ नाम का एक ऑल टाइम सुपरहिट गाना था. आनंद बक्षी के बक्शी इस गाने को किशोर कुमार ने गाया था.

आज हम बात इस फ़िल्म के इसी गाने की करने जा रहे हैं जिसे सुनकर सुसाइड करने गए एक का इरादा बदल गया और उसने ज़िंदगी को नए सिरे से जीना का फैसला किया. दरअसल, बात तब की है जब ‘दोस्त’ फ़िल्म रिलीज़ होने वाली थी. फ़िल्म का ये गाना पहले से ही हिट हो चुका था. रिलीज़ के कुछ समय बाद 1 दिन आनंद बख़्शी के पास उनके बेटे राकेश एक लिफ़ाफ़ा लेकर आए. बख़्शी ने जब लिफ़ाफ़ा खोला तो उसमें एक व्यक्ति का पत्र था. 

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व्यक्ति ने लिखा था- मैं अपनी ज़िंदगी से तंग आ गया था. मेरे पास कोई काम नहीं था और नहीं आमदनी थी. मुझे पता नहीं था कि मैं घर वापस कैसे जाऊं. तब मैंने सोचा कि रेल की पटरी पर जाकर ख़ुदकुशी करने का फैसला किया. इसके बाद मैं रेल की पटरी पर जाकर लेट गया और ट्रेन का इंतज़ार करने लगा कि ट्रेन आएगी मेरे ऊपर से गुज़र जाएगी और मैं ज़िंदगी की सब उलझनों से मुक्त हो जाऊंगा. 

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रेलवे ट्रेक के किनारे एक बस्ती थी, जहां रेडियो पर गाना बज रहा था… ‘गाड़ी बुला रही है’. थोड़ी देर बाद मेरे कानों में गाने की ये लाइनें पड़ी… ‘गाड़ी का नाम न कर बदनाम, पटरी पे रख के सिर को, हिम्मत न हार कर, कर इंतज़ार, आ लौट जाएं घर को’. ये सुनने के बाद जान देने का मेरा इरादा ख़त्म हो गया और मैं घर लौट आया.

आपकी वजह से मेरा पुनर्जन्म हुआ है और मेरी आगे की जिंदगी का श्रेय आपको ही जाता है. अगर आपने ये गाना नहीं लिखा होता, तो उस रोज मैं रेल से कटकर मर गया होता. आज में बेहद ख़ुश हूं क्योंकि आपके इस गाने ने मुझे नई ज़िंदगी दी है. इसके लिए आपका शुक्रिया. 

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आनंद बख़्शी ने कई साल पहले एक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में इस चिट्ठी का ज़िक्र किया था. इस दौरान उन्होंने कहा चिट्ठी पढ़ कर मैं बेहद भावुक हो गया था. मैं वो लिफ़ाफ़ा लेकर अपने बेटे के पास गया और उससे कहा भले ही मुझे बहुत सारे अवार्ड-रिवॉर्ड मिले हों, बहुत दौलत-शोहरत मिली हो, लेकिन ये खत मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इनाम है. ये मेरी ज़िंदगी होने के सबसे हसीन मायनों में से एक है. फिर मैंने उस चिट्ठी को बेहद प्यार से चूमा और उसे अपनी शर्ट की जेब में रख लिया.

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