रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध को 15 दिन बीत चुके हैं. इस दौरान न तो यूक्रेन न ही रूस पीछे हटने को तैयार है. इसकी वजह से दोनों देशों की आम जनता को तकलीफ़ों का सामना करना पड़ रहा है. रूसी सेना के हमलों से यूक्रेन में अब तक जान-माल का काफ़ी नुक्सान हो चुका है. इस दौरान भारत सरकार कई छात्रों को यूक्रेन से भारत ले आई है जबकि अब भी यूक्रेन में सैकड़ों भारतीय फंसे हुये हैं, इनमें अधिकतर छात्र हैं. इस बीच पडोसी देश पोलैंड ने यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को मुफ़्त वीज़ा देने देने की घोषणा की है. पोलैंड खुलकर भारतीय छात्रों की मदद कर रहा है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आख़िर पोलैंड, भारत पर इतना मेहरबान क्यों है?

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चलिए जानते हैं इसके पीछे की असल वजह क्या है?

भारत ने दी थी पोलैंड शरणार्थियों को पनाह

पोलैंड (Poland) की मदद के पीछे की वजह दशकों पुराना इतिहास है. पोलैंड के इतिहास के लिए ये बेहद मायने रखती है. 80 साल पहले भारत ने पोलैंड की मदद की थी, जब उसके नागरिक मुसीबतों का सामना करना पड़ा था. तब भारत के एक राजा ने पोलैंड की महिलाओं और बच्चों को अपने राज्य में पनाह देकर इंसानियत की मिसाल पेश की थी. यही वजह है कि आज भी पोलैंड में भारत के उस राजा को भगवान की तरह पूजा जाता है. इसके अलावा उनके नाम से पोलैंड में कई स्कूल, चौराहे, पार्क और सड़कें हैं. पोलैंड ने गुजरात के जामनगर के राजा रहे दिग्विजय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) का कई सालों पहले का कर्ज चुकाने के लिए ये बड़ा फ़ैसला लिया है.

दिग्विजय सिंहजी जडेजा, Digvijay Singhji Jadeja
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द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1939 में जर्मनी ने पोलैंड पर धावा बोल दिया. जर्मन तानाशाह हिटलर और सोवियत रूस के तानाशाह स्टालिन के बीच गठजोड़ हुआ. इसके बाद ब्रिटेन ने पौलेंड को एक संप्रभु देश घोषित कर दिया. इसके बाद सोवियत सेना ने भी पोलैंड पर धावा बोल दिया. जर्मनी और सोवियत संघ का पोलैंड पर कब्जा होने तक भीषण तबाही मच चुकी थी. इस दौरान हज़ारों सैनिक मारे गए और भारी संख्या में बच्चे अनाथ हो गये. अनाथ बच्चे कैंपों में बेहद अमानवीय हालात में जीने को मजबूर थे. सन 1941 में सोवियत संघ ने इन कैंपों को भी खाली करने का फरमान जारी कर दिया. 

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हिटलर की सेना ने जब पोलैंड पर किया आक्रमण

3 सितंबर, 1942 को जर्मनी ने एक बार फिर जब पोलैंड पर आक्रमण किया तो कुछ दिन में इसने भयानक रूप ले लिया. इस दौरान पोलैंड की सेना हिटलर की सेना को कड़ी टक्कर दे रही थी. लेकिन नाजियों के सामने टिकना इतना आसान नहीं था इसलिए पोलैंड के सैनिकों ने अपने देश की क़रीब 500 महिलाओं और 200 बच्चों को एक जहाज़ में बैठाकर जहाज़ के कैप्टन से कहा कि इन सभी लोगों को एक ऐसे देश में छोड़ दो, जो इन्हें शरण दे. अगर हम बचे रहे तो दुबारा मिलेंगे. इस दौरान टर्की समेत कई देशों ने रूस और जर्मनी के हमले के डर से युद्ध में अनाथ हुये बच्चों को रखने से इंकार कर दिया था.

world war II Germany vs Poland
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ईरान ने शरण देने से किया था इंकार

क़रीब 500 महिलाओं और 200 बच्चों को लेकर जब ये जहाज़ समुद्री रास्ते से होते हुये 'ईरान' के सिराफ़ बंदरगाह पहुंचा तो ईरान ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया और उन्हें वहां से चले जाने को कहा दिया. फिर जहाज़ 'सेशेल्स' पहुंचा, लेकिन वहां भी उसे शरण नहीं मिली. इसके बाद पोलैंड का ये जहाज़ 500 महिलाओं और 200 बच्चों को लेकर भटकता हुआ गुजरात के जामनगर पहुंचा. उस वक्त जामनगर के राजा दिग्विजय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) हुआ करते थे. दिग्विजिय सिंहजी ने इंसानियत की मिसाल पेश करते हुये पोलैंड के इन शरणार्थियों को अपने यहां शरण देने का फ़ैसला किया.

दिग्विजय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja)

दिग्विजय सिंहजी जडेजा, Digvijay Singhji Jadeja
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ब्रिटिश सेना से बहस कर महाराजा ने अपनाए बच्चे

इसी बीच पोलैंड के इन अनाथ बच्चों व महिलाओं को लेकर ब्रिटेन की वॉर कैबिनेट की मीटिंग हुई. इस दौरान कैंपों में रहने वाले अनाथ पोलिश बच्चों के लिए विकल्पों पर विचार किया गया. इस मीटिंग में नवानगर (जामनगर) के राजा दिग्विजिय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) भी शामिल थे. तब भारत पर अंग्रेज़ों की हुकूमत थी और जामनगर ब्रिटिश रिसायत थी. महाराजा दिग्विजय सिंह ने कैबिनेट के सामने प्रस्ताव रखा कि वो नवानगर में पोलैंड के अनाथ बच्चों शरण देना चाहते हैं. इसे लेकर महाराजा को बिट्रिश सेना से काफ़ी बहस करनी पड़ी. आख़िरकार उनके प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई.

दिग्विजय सिंहजी जडेजा, Digvijay Singhji Jadeja
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अनाथ बच्चों व महिलाओं की दी सभी सुविधाएं

ब्रिटिश सरकार, बॉम्बे पोलिश कॉन्स्युलेट, रेड क्रॉस और रूस के अधीन पोलिश फ़ौज़ के संयुक्त प्रयास से इन बच्चों व महिलाओं के अलावा युद्ध की वजह से कैंपों में रह रहे 1000 अन्य अनाथ बच्चों को भी भारत भेजा गया. इस दौरान महाराजा दिग्विजिय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) ने जामनगर से 25 किलोमीटर दूर बालाचाड़ी गांव में उन्हें शरण दी. महाराजा ने बालाचाड़ी में हर बच्चे को कमरों में अलग-अलग बिस्तर, खाने-पीने, कपड़े, स्वास्थ्य और खेल की सुविधायें भी दी. इसके अलावा राजा साहब ने बालाचढ़ी के सैनिक स्कूल में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था भी की. लाइब्रेरी बनवाकर उनमें पोलिश भाषा की किताबें रखवाई गईं. बालाचाड़ी गांव में पोलिश त्याहोर भी धूमधाम से मनाए जाते रहे. सभी खर्च महाराजा ने उठाया करते थे. इस दौरान उन्होंने पोलैंड सरकार से कभी कोई रकम नहीं ली. पोलैंड के शरणार्थी जामनगर में क़रीब 9 साल तक रहे.

Polish Children
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साल 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने पर पोलैंड को सोवियत यूनियन में मिला लिया गया. अगले वर्ष पोलैंड की सरकार ने भारत से बच्चों की वापसी को लेकर महाराजा दिग्विजिय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) से बात की. महाराजा ने पोलिश सरकार को अमानत की तरह संभालकर रखे गए सारे बच्चे सौंप दिए. साल 2013 में पोलैंड से 9 बुज़ुर्गों का एक समूह गुजरात के बालाचाड़ी आया. ये वही लोग थे जिन्होंने बालाचाड़ी में अपना बचपन बिताया था. इस दौरान अपनी याद में बने स्तंभ को वो बेहद भावुक हो गये थे. जिस लाइब्रेरी में कभी वो पढ़ा करते थे, वो आज सैनिक स्कूल में तब्दील हो गया है. दिग्विजय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja)

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पोलैंड में दिग्विजिय सिंहजी के नाम से स्कूल व सड़कें  

80 साल बाद आज भी पोलैंड में दिग्विजिय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) को नायक की तरह पूजा जाता है. पोलैंड ने महाराजा को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'कमांडर्स क्रॉस ऑफ़ दि ऑर्डर ऑफ़ मेरिट' भी दिया. इसके अलावा पोलैंड की राजधानी वॉरसॉ के एक चौक का नाम दिग्विजय सिंह के नाम पर रखा गया है. पोलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री व्लादिस्लॉ सिरोर्स्की ने जब राजा साहब से पूछा था आपने हमारी इतनी मदद की है, बदले में हम आपकों क्या दे सकते है? जवाब में राजा साहब ने कहा कि वो पोलैंड में उनके नाम से एक स्कूल खुलवा दें. आज भी पोलैंड में जाम साहब दिग्विजय सिंह के नाम से स्कूल है.

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क्रिकेट से भी है महाराजा का ख़ास रिश्ता

दिग्विजिय सिंहजी जडेजा (Digvijaysinhji Jadeja) का निधन साल 1966 में हुआ था. भारत में घरेलू क्रिकेट 'रणजी ट्रॉफ़ी' महाराजा दिग्विजय सिंहजी जडेजा के पिता महाराजा रणजीत सिंहजी जडेजा के नाम पर ही खेली जाती है. रणजीत सिंहजी प्रोफ़ेशनल क्रिकेटर हुआ करते थे. अंग्रेज़ों ने उनके नाम पर 1934 में रणजी ट्रॉफ़ी क्रिकेट टूर्नामेंट शुरू किया था. ये भारत का सबसे बड़ा घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट है.

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