Sanjay Leela Bhansali (संजय लीला भंसाली) सालभर में भले ही एक फ़िल्म बनाते हैं, लेकिन ज़बरदस्त बनाते हैं. इसलिये उनका नाम बॉलीवुड के बेहतरीन निर्देशकों में आता है. संजय लीला भंसाली के बारे में एक बात और मशहूर है. वो ये है कि उनकी हर फ़िल्म जितनी ख़ूबसूरत होती है, उतनी ही विवादों भरी भी. संजय लीला भंसाली जब भी कोई फ़िल्म लाते हैं, उससे विवाद जुड़ा जाता है. फिर चाहे लड़ाई फ़िल्म के नाम को लेकर हो या कहानी. इस भी कुछ इन्हीं कारणों को लेकर वो सुर्खियों में हैं.  

संजय लीला भंसाली
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दरअसल, संजय लीला भंसाली की अगली फ़िल्म 'पाकिस्तान' की रेडलाइट 'हीरा मंडी' पर होगी. लाहौर के रेडलाइट एरिया को 'शाही मोहल्ला' भी कहा जाता है. पाकिस्तानी सिनेमाजगत के लोगों ने भंसाली की फ़िल्म को लेकर सवाल खड़े किये है. उनका मानना है कि भारतीय प्रोड्यूस 'पाकिस्तानी' की किसी जगह पर फ़िल्म कैसे बना सकते हैं. सवाल ये है कि हीरा मंडी में ऐसा क्या है जो इसे लेकर इतना विवाद हो रहा है.

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पाकिस्तान की रेडलाइट
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क्या है पाकिस्तान की हीरा मंडी का इतिहास?  

कहते हैं कि 'हीरा मंडी' का नाम सिख महाराजा रणजीत सिंह के मंत्री 'हीरा सिंह' के नाम पर रखा गया था. 'हीरा सिंह' ने ही यहां अनाज मंडी का निर्माण भी कराया था. इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने मंडी में तवायफ़ों को भी बसाया. वहीं महाराजा रणजीत सिंह की ने हमेशा इस इलाके को संरक्षित करने का काम किया. इस मोहल्ले को 'शाही मोहल्ले' के नाम से भी जाना जाता है. 'शाही मोहल्ले' इसलिये, क्योंकि ये लाहौर क़िले के एकदम बगल में हैं.  

हीरा मंडी
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मुग़लकाल में कैसी थी हीरामंडी? 

मुग़लकाल के दौरान अफ़गानिस्तान और उजबेकिस्तान जैसी जगहों से महिलाओं को इस महौल्ले में लाया जाता है. आज के दौर की तरह उस वक़्त तवायफ़ बदनाम नहीं थीं. मुग़लकाल में वो संगीत, नृत्य, तहजीब और कला से जुड़ी हुई थीं. उनके होने से उच्च वर्ग के लोगों की महफ़िलें सजती थीं, जिसके लिये वो उनके कद्रदान भी होते थे. थोड़े समय बाद शाही महौल्ले में हिंद नहाद्वीप के इलाकों से भी महिलाएं आने लगीं, जो कि मुग़लों के सामने क्लासिक नृत्य करके उनका मनोरंजन करती थीं.  

हीरामंडी
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कुछ समय बाद मुग़ल दौर की चमक फीकी पड़ने लगी. विदेशियों के आक्रामण के दौरान 'शाही मोहल्ले' में बसे तवायफ़खानों को उजाड़ा जाने लगा. इसके बाद धीरे-धीरे यहां वेश्यावृति पनपने लगी और अब वो वक़्त भी आ चुका है जब हैं किन्नरों का डांस देखा जाता है. हांलाकि, 1947 के बाद सरकार ने इलाके में आने वाले ग्राहकों के लिये कई सुविधाएं मुहैया कराईं थीं, लेकिन फिर भी सफलता नहीं मिली.  

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दिन के समय लाहौर का ये मोहल्ला बिल्कुल नॉर्मल मार्केट की तरह ही दिखता है, पर अंधेरा होते ही ये रेडलाइट एरिया बन जाता है. अगर आपने 'कलंक' फ़िल्म देखी है, तो याद होगा कि उसमें लाहौर के इस शाही मोहल्ले का ज़िक्र किया गया था.