आंसुओं से भरी आंखें और उम्मीद से बस को देखती राजी देवी ने अपने बेटे साहब लाल की ओर देखते हुए कहा, बस अब उन्हें घर जाना है. वो अब बड़े शहर में कभी नहीं आएंगी.

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मगर बसों का हाल ये है कि जो पहला आया सीट उसकी. इसके चलते राजी देवी और उनके परिवार को एक भी सीट नहीं मिल सकी. परिवार में राजी देवी, साहब लाल, उसकी पत्नी और दो बच्चे, उसका भतीजा और उसकी पत्नी हैं. ये सभी लोग और अन्य लोग गुड़गांव के सेक्टर 9A के कम्युनिटी सेंटर में बसों का इंतज़ार कर रहे हैं, जो इन्हें उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर तक ले जाएगी.

70 साल की राजी देवी कुछ महीनों पहले गुड़गांव अपने बेटे के साथ आई थीं, यहां उनका बेटा एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करता है, लेकिन अब लॉकडाउन के चलते काम नहीं है. शहर की आपाधापी से परेशान राजी देवी बस अपने घर लौटना चाहती हैं. सभी सदस्य भदोही के रहने वाले हैं.

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राजी देवी ने कहा,

वो पहली बार अपने गांव से बाहर आई हैं. उन्होंने अपनी स्थानीय भाषा में बेटे से कहा, ‘बेटुआ अब हम कभी नहीं आईं, तू बेशक़ हमका कांधा देन भी मत आइये. हमका नहीं देखना शहर. 
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लाल ने कहा,

हम सभी अपने गांव भदोही के दारा पट्टी पैदल ही चले जाते, जो 850 किलोमीटर दूर है. मगर मां इतनी लंबी यात्रा नहीं कर सकतीं. इसलिए हमने पैदल जाने की कोशिश नहीं की. अब देखते हैं हम कैसे पहुंचेंगे अपने गांव?

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