ठंड शुरू हो गई है और सुबह-सुबह उठकर दिल्ली की ठंड में ऑफ़िस जाने से बड़ा टास्क तो कुछ नहीं है. फिर भी उठी और तैयार होकर बस स्टैंड आई इसके बाद शुरू हो गया दिल्ली की बस में धक्के खाने का सफ़र. ख़ैर, ये तो मेरी रोज़ की जंग है मगर मेरी इसी जंग से मैं आपके लिए रोज़ दिल्ली से जुड़े कुछ क़िस्से लाती हूं, जो आपको दिल्ली में न रहते हुए भी दिल्ली की ज़िंदगी से मिलवाते हैं.

Delhi bus
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मेरी आदत है बस में बैठते ही सबसे पहले मम्मी को फ़ोन करती हूं. फ़ोन उठाते ही मम्मी का पहला सवाल होता है कपड़े ठीक से पहने हैं, इसका मतलब होता स्वेटर वगैरह पहना है न क्योंकि दिल्ली की ठंड के चर्चे कानपुर तक हैं. मेरा जवाब होता है, हां भाई पहने हैं. इतनी बात होती है और वो फ़ोन रख देती हैं.

मेरी मम्मी मेरी इतनी चिंता करती हैं मगर जो मैं रोज़ देख रही हूं वो अगर देख लें तो पता नहीं क्या हो? दरअसल, मेरी बस जिस रास्ते से आती है उस रास्ते पर मुझे बस की खिड़की से बाहर एक अलग ही बचपन दिखाई देता है, जो बच्चे ठंड में भी हल्के और फ़टे हुए कपड़ों में ख़ुश हैं. वो कांपते नहीं, बल्कि पानी में नहाते और खेलते दिखते हैं.

Slum Kids
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उनको देखकर लगता है कि असल में मौसम का मज़ा तो वो ले रहे हैं. हालांकि, ये उनकी मजबूरी हो सकती है क्योंकि उनके पास न ही घर है और न ही तन ढकने के लिए पर्याप्त कपड़े, जिसकी वजह से वो सड़कों पर फ़ुटपाथ पर रह रहे हैं. मगर ये सोचिए हम अच्छे घरों में रहकर क्या कर लेते हैं? इतना कुछ पहनने के बाद भी हम ठंड के लिए रोते रहते हैं और ये हैं कि सड़कों पर भी ख़ुश हैं. मन में एक सवाल आता है जैसे मेरी मम्मी कानपुर से मेरे लिए परेशान होती हूं, क्या इन बच्चों के पेरेंट्स भी परेशान होते होंगे? क्या वो भी अपने बच्चों को एक बेहतर ज़िंदगी देना चाहते होंगे? मगर इन बातों से ये मासूम बिलकुल दूर हैं इन्हें पता भी नहीं है कि इनकी ज़िंदगी में क्या कमी है? फिर भी ये ख़ुश हैं.

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बस की खिड़की के बाहर की ये ज़िंदगी मुझे अच्छी लगती है. इन बच्चों को देखकर मुझे मेरा बचपन याद आता है. मगर मेरा बचपन इन जैसा नहीं था. मैंने मौसम के साथ ऐसी मस्ती नहीं की और आज भी नहीं कर पाती हूं. अच्छे घर में रहने का क्या फ़ायदा जब ठंड मीठी ही न लगे जैसी इन बच्चों को लगती है.

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बस के अंदर से इन्हें देख-देख कर ख़ुश होती रहती हूं. इनकी शैतानियां देखकर मैं भी बिना बात के हंस लेती हूं. ये मासूम से बच्चे मुझे रोज़ इस ठंड में ऑफ़िस जाने की हिम्मत देते हैं. इस ठंड को कोसने की नहीं, बल्कि इसे खुलकर महसूस करने की वजह देते हैं.

आपके साथ भी ठंड से जुड़ा कोई क़िस्सा हो, तो हमें कमेंट बॉक्स में बताइएगा ज़रूर.

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