घूमना-फिरना एक जगह से दूसरी जगह जाना सबको अच्छा लगता है, मुझे भी बहुत पसंद है. जब मैं आसमान में उड़ते इन पक्षियों को अपनी कैब, बस, मेट्रो या फिर घर की छत से देखती हूं तो लगता है इनकी ही तरह कहीं चली जाऊं. ये बिना सोचे समझे कहीं के लिए भी उड़ जाते हैं और जब मन करता है कहीं भी बैठ जाते हैं, इनकी भी तो कोई ख़ास जगह और ट्रिप होगी न! क्यों नहीं होगी? जब हमारी हो सकती है तो इनकी भी होगी.

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इन्हीं पक्षियों की उधेड़बुन में अपने सफ़र को पूरा करते-करते मुझे भी अपनी एक ट्रिप याद आ गई, जो मेरे लिए सबसे यादगार रही, क्योंकि उस ट्रिप के दौरान मैं उन पलों से गुज़री जिनसे मैं गुज़रने के सपने देखते थी. वो सपना जिसमें अंधेरे से भरा सुनसान रास्ता, दोनों तरफ़ पेड़ और सड़क के बीचों बीच मेरी बस. इसके अलावा सुबह उठी तो सामने ऊंचे-ऊंचे पहाड़, हरियाली और मैं अपने होटल की बालकनी पर खड़ी हूं.

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ये पूरा सपना मेरा 2017 में पूरा हुआ जब मैं नैनीताल गई. जब हम निकले थे तो उजाला था और हम काफ़ी लोग टूर एंड ट्रैवल्स वाली बस में थे. सब मस्ती कर रहे थे. जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे अंधेरा होता जा रहा था. थोड़ी देर बाद जब दिल्ली क्रॉस हुआ और हम नैनीताल को टच करने लगे, तभी मैंने अपनी खिड़की से बाहर देखा तो वो सीन बिलकुल वही था. सड़क के बीच में हमारी बस थी दोनों तरफ़ पेड़ और सुनसान अंधेरा रास्ता. सब डर रहे थे कि कहीं कोई जानवर न आ जाए, लेकिन मैं तो अपने सपने को जीने में बिज़ी थी. 

ख़ैर, ऐसा कुछ नहीं हुआ, जो अकसर होता है उन रास्तों पर अकसर जानवर दिख जाते हैं. फिर हमलोग रिसॉर्ट पहुंचे, तो वहां पर एक गार्ड अंकल थे जो बिलकुल रामसे ब्रदर्स की फ़िल्म से इंस्पायर लग रहे थे, उनके बगल में ही एक बड़ा सा कुत्ता था, जिसका नाम ‘ऑक्सन’ था. वो हमें हमारे रूम्स तक ले गए, मुझसे रहा नहीं गया मैंने बोल दिया कि आप बिल्कुल रामसे ब्रदर्स की फ़िल्मों वाले वॉचमैन लग रहे हैं, तो वो हंसने लगे.

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हम सब अपने-अपने रूम्स में पहुंच चुके थे, उस समय क़रीब रात का 3 बज रहा था और हमें 5:30 बजे जिम कॉर्बेट के लिए निकलना था. वो भी मेरे लिए एक एक्साइमेंट था क्योंकि पहली बार पार्क में टाइगर को देखती, जो गाड़ी वाला हमें लेने आया था वो जैसे बता रहा था कि टाइगर पानी पीते दिख जाते हैं तो कभी चलते हुए.    

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नींद तो आ नहीं रही थी क्योंकि दिमाग़ में यही सब चल रहा था. फिर अचानक से नींद आ गई और 5:30 बजे आंख ही नहीं खुली. इस वजह से जिम कॉर्बेट हम सब लेट पहुंचे और टाइगर देखने का प्लान फ़्लॉप हो गया. इसके बाद जिम कॉर्बेट में टाइगर तो नहीं दिखे मैगी-वैगी खाकर वापस रिज़ॉर्ट में आए और पैकिंग करने लगे.

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अब हमें रामनगर से नैनीताल के लिए निकलना था. हम लोग सब टाइगर न दिखने के अफ़सोस के साथ नैनीताल रवाना हो गए. वहां जिस रिसॉर्ट में पहुंचे उसे देखते ही मेरा सारा अफ़सोस ख़ुशी में बदल गया. वो इसलिए क्योंकि जो रूम मुझे मिला था. उस रूम की बालकनी से पहाड़ और हरियाली दोनों दिखती थी, जो किसी ख़ूबसूरत सपने से था. उस समय थोड़ा शाम हो चुकी थी, लेकिन मुझे अगली सुबह का इंतज़ार था. वो सुबह आई और मैं सबसे पहले उठकर बालकनी में खड़ी हो गई और इस वक़्त उस सपने को जी रही थी, जो मैंने अपनी बंद आंखों से नहीं, बल्कि खुली आंखों से देखा था.

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मैं बालकनी पर खड़ी थी, बादलों के धुएं के साथ-साथ पहाड़ों और हरियाली के बीच ठंड से ठिठुरते हुए जो सिहरन हो रही थी उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है. बस उसे महसूस कर रही थी और बंद आंखों से उसे जी रही थी.

उस ट्रिप को शुरू करने से पहले कई सारी चीज़ों की लिस्ट बनाई थी. टाइगर, पहाड़, बादल, हरियाली और झील. इनमें से टाइगर को छोड़कर बाकी सारी चीज़ों को देखने की ख़्वाहिशें पूरी हूईं. 

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