ज़िंदगी की भाग-दौड़ में जब रुको तो लगता है कि सबकुछ है, लेकिन सुकून नहीं है. मगर कभी-कभी कुछ छोटी सी बात भी मन को शांति दे जाती है. मैं रोज़ ट्रैवल की कहानियां लिखती हूं और लोगों से बात करते-करते पता चलता है कि कैसे छोटा सा एहसास भी मन में उठ रहे तुफ़ान को रोक देता है. ऐसी ही एक कहानी आज आपको बताऊंगी.

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दरअसल, मेरी सीनियर गईं तो किसी और जगह थीं, लेकिन अपनी गाड़ी होने का फ़ायदा तो होता ही है तो उन्होंने भी उठाया. मसूरी से उन्हें सीधे दिल्ली आना था, लेकिन अपनी गाड़ी थी तो स्टेयरिंग दिल्ली के रास्ते की जगह हरिद्वार के रास्ते पर घुमा दिया. हालांकि, उस ट्रिप की कोई तैयारी नहीं थी फिर भी वो लोग चले गए. वहां पहुंचकर जैसे-तैसे उन्होंने एक धर्मशाला ढूंढी. वहां रात में रुके धर्मशाला अच्छी नहीं थी, लेकिन उसकी खिड़की से सीधे हर की पौड़ी का वो बीचों-बीच वाला टॉवर दिखता था.

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उस दिन तो सब सो गए. अगले दिन खाने की तलब लगी तो सब स्वादिष्ट खाने की तलाश में निकले. कहते हैं न ढूंढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं और फिर जब भगवान के ही घर में हो तो जो मांगोगे वो तो ज़रूर मिलेगा. उन्हें कुछ खाने को मिल गया. फिर सबलोग अपने रूम पर आ गए. उन्हें खिड़की से गंगा जी की लहरें इतनी अच्छी लगीं कि वो लोग वहीं बैठ गए जाकर.

रात के क़रीब डेढ़ बज रहे थे और वो अपने फ़्रेंड्स के साथ गंगा जी के किनारे पर बैठी थीं. चारों-तरफ़ सन्नाटे के बीच गंगा जी की लहरों की आवाज़ बहुत ही दिल छूने वाली थी. जैसे-जैसे लहरें उठ रही थीं अंदर का शोर शांत हो रहा था. उन्हें ऐसा लग रहा था कि वो पूरी रात वहीं बैठी रहीं. वहां से जाने का मन ही नहीं हो रहा था. फिर उन्होंने मन को मनाया और वहां से उठकर अपने रूम पर चली गईं क्योंकि सुबह उनकी ट्रेन थीं.

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भले ही वो वहां पर थोड़ी देर बैठी थीं, लेकिन शोर-शराबे वाले शहर दिल्ली में रहने के लिए वो कुछ देर की शांति किसी दवाई से कम नहीं थी. आज भी ये यादें इस शहर की आवाज़ों के बीच उनके मन को शांत कर देती हैं.

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