कुछ दिनों पहले ये तस्वीर हम सबके सामने आई-

Source: She The People
Source: New York Times

ज्योति बिहार के दरभंगा ज़िले की रहने वाली है. 15 वर्षीय इस लड़की ने अपने चोटिल पिता को घर पहुंचाया वो भी 7 दिन साइकिल चलाकर. रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इन 7 दिनों में 2 दिन ज्योति को खाने-पीने को कुछ नहीं मिला.


ज्योति की पीठ थपथपाते हुए साइक्लिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने उसे ट्रायल के लिए बुला लिया. ज्योति की उपलब्धियां देख उसके लिए दिल से दुआएं निकलती है और मुंह से 'वाह! ऊपर वाला ऐसी बेटी सबको दे.'

ज्योति की कहानी ने बिज़नेसवुमन और अमेरिकी राष्ट्रपति की बेटी, इवांका ट्रंप का भी ध्यान खींचा. बीते शुक्रवार को इवांका ने ज्योति की कहानी शेयर की और ये लिखा,

'15 साल की ज्योति ने अपने ज़ख़्मी पिता को 1200 किलोमीटर से ज़्यादा, 7 दिनों तक साइकिल चलाकर घर पहुंचाया. धैर्य और प्रेम की पराकाष्ठा ने भारतीय जनता और साइक्लिंग फ़ेडरेशन का ध्यान खींचा'

इस ट्वीट के साथ ही इवांका का नाम ट्रेंड करने लगा, ट्विटर जनता 2 हिस्सों में बंट गई. कुछ लोगों ने इवांका का धन्यवाद किया जिसमें मीडिया संस्था और पत्रकार भी शामिल थे. कई मीडिया संस्थाओं ने इसको 'बिहार की बेटी की तारीफ़' ज़ोन में दिखाया.

इवांका के ट्वीट पर गद-गद हुए कुछ लोग-

ज्योति सिंह की कहानी को सोशल मीडिया का एक तबका 'नारी शक्ति', 'श्रवण कुमार', 'एक बिहारी सौ पर भारी' ज़ोन में भी पेश कर रहा था. निस्संदेह ज्योति ने जो कर दिखाया वो अच्छे-अच्छों के बस की बात नहीं है. ज्योति ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और पिता-प्रेम का परिचय तो दे दिया लेकिन दूसरी तरफ़ समाज की कड़वी सच्चाई भी सामने लाकर दिखाई, वो सच्चाई जिसे इवांका ट्रंप अनदेखा कर बैठीं. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ ज्योति को 2 दिन खाना नहीं मिला, ज़ख़्मी पिता को 7 दिन में कोई मेडिकल सहायता मिलने की भी ख़बर नहीं दिखी. ज्योति की पीठ थपथपाई गई, मंज़िल पर पहुंचने के बाद. ज्योति को रास्ते में किसी भी तरह की मदद नहीं मिली. इस बात से इवांका, मीडिया के कुछ लोग आंख मूंद बैठे हैं.

इवांका को मज़दूरों का पलायन दिखाई नहीं दिया,रोज़ सड़कों पर हो रही उनकी मौत नहीं दिखी.

कुछ मीडिया संस्थाओं को एक ट्वीट ने इवांका का कायल बना दिया. इवांका की भूल पर ट्विटर की भी नज़र पड़ी और बहुत से लोगों ने उन पर सवाल दाग़े-

और इसमें कोई दोराय नहीं है कि जब तक हमने ये कॉपी ख़त्म की होगी, पब्लिश पब्लिश की होगी और आपने पढ़ी होगी, तब तक देश की सड़कों पर किसी मज़दूर की चप्पल टूटी होगी, किसी को भूख से पेट में दर्द उठा होगा, किसी का प्यास से गला सूख गया होगा, कोई बेहोश हो गया होगा और भगवान न करे पर शायद किसी ने दम तोड़ दिया होगा...