9 अप्रैल 2016... आंखों में ढेर सारे सपने लेकर मैं दिल्ली आई.


निज़ामुद्दीन स्टेशन पर 10-12 कुलियों ने लाल लिबास में स्वागत किया. जिस तरह से वो लोग दौड़कर आगे बढ़े, एक पल को लगा कि बैग न दिया तो पीट-पाट देंगे. बाहर निकलर टैक्सी, ऑटो वालों की भीड़ देखकर लगा मानों हम कोई बड़ा युद्ध जीतकर आए हैं... वो हमसे बात किए बग़ैर आपस में ही डिसाइड करने लगे कि हमें कौन ले जाएगा!

ये मेरी इस शहर से पहली मुलाक़ात थी. अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी, मन में हल्का सा डर, दिमाग़ में कई चिंताएं और दिल में आत्मविश्वास लिए हम पीजी पहुंचे. अंदाज़ा पहले से था, लेकिन कमरा देखकर एक बार फिर याद आ गया कि दिल्ली देश का सबसे ज़्यादा आबादी वाला शहर है. कमरा बड़ा था और उसमें थी कूलर के लिए एक बड़ी सी खिड़की. मतलब कूलर के लिए छेद और इंसानों के लिए घंटा कुछ नहीं. दिमाग़ भन्नाया भी और ख़ुशी भी हुई कि अंधेरी कोठरी नहीं मिली. 

शाम में निकले अपना ऑफ़िस देखने, झंडेवालान. टीवी में वो छाती चीरने वाले अति विशालयकाय हनुमान जी को सालों से देखा था, आंखों के सामने देखना बेहद अलग अनुभव था. दफ़्तर को बाहर से देखकर, नियमानुसार 'Groupie' लेकर, हम दोस्तों के साथ दिल्ली-दर्शन को निकल पड़े.

सबसे पहले गए कनॉट प्लेस... इतनी साफ़-सुथरी सड़कें देखकर अपनी ही आंखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था (जस्ट स्मॉल टाउन वुमन थिंग्स). एक चक्कर मारकर सोचा झंडेवाले पार्क में बैठें. तब तक हमें ये नहीं पता था कि सेंट्रल पार्क, असल में प्रेमी-प्रेमिका मिलन पार्क है. भाई एडल्ट फ़िल्म के कई टीज़र चालू थे उधर. इतने ख़ुलेआम PSA देखकर खु़शी हुई कि चलो यहां प्रेम को आज़ादी मिली है और छोटे शहरों की तरह फ़ोन ही सहारा नहीं है. 

मोमोज़ भकोसकर वापस हॉस्टल आ गए. अति सस्ते और अति टेस्टी मोमोज़ से पॉकेट, पेट और दिल तीनों प्रसन्न हो गए. और ये था दिल्ली में पहला दिन.  

Source: Britannica

उस दिन को आज 3 साल से ज़्यादा हो गए. पहली वाली नौकरी भी बदल गई है और पहले वाला पीजी भी. इस शहर में 3 साल गुज़ारना आसान नहीं था. हालांकि उम्र के बीते 3 साल में आर्थिक आज़ादी तो मिली पर इस शहर में 3 साल बिताना बेहद मुश्किल है. 

पहली तो जैसा कि लोगों को होता है अमूमन वैसा अपनापन नदारद है. फ़्लैट फ़ैमिली के पास लिया है और वहां कि फ़ैमिली तभी दरवाज़ा खटखटाती है जब Contri लेनी होती है (अगर बिल्डिंग मेंटेनेंस इंक्लूडेड है तो वो भी नहीं). फ़ैमिली रह रही तो सेफ़्टी की भी गारंटी नहीं है, घर के नीचे छेड़छाड़ हुई थी, अंकल-आंटी ने देखा था चूं तक न की थी. अगर ये मेरे घर के आस-पास हुआ होता तो देखने वाले हर अंकल, भैया, समवर्षी लड़के को थुर देते. 

कई लोग मिले, जिन्हें दिल्ली से इश्क़ है (मसलन रवीश कुमार) पर कुछ बाहरवालों को इस शहर में एडजस्ट करते-करते ही दशक बीत जाता है. भागते-दौड़ते इस शहर में दिन की शुरुआत, चाय से हो न हो 'बे@चो#' से ज़रूर होती है. जैसे बनारस के लिए 'भो*# के', वैसे ही दिल्ली के लिए 'बे@चो#'. गुस्सा, प्रेम, दोस्ती, ख़ुशी हर एक इमोशन में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है.  

Source: DU Updates

करोड़ों लोगों वाले इस शहर को मैंने कभी सोते नहीं देखा. रात के 3 बजे भी यहां 'तू चीज लाजवाब, तेरा कोए न जवाब' बजाती तेज़ रफ़्तार SUVs मोहल्ले से निकलती हैं. ये ऐसा शहर है, जहां लोग Smog में भी मास्क लगाकर घूमने निकलते हैं.


3 साल तक हर दिवाली और होली मनाने के बाद ये निष्कर्ष निकाला है कि यहां की दिवाली जितना 'आग लगाती' है, होली उतना ही 'पानी डालती' है... मेट्रो, कैब, बस, ऑटो में सफ़र करके ये इल्म हुआ है कि यहां के बूढ़े जितना आंख सेकते हैं, उतना ही 13-14 साल के बच्चे भी.  

Source: Times of India

ये वो शहर है जहां से पूरे देश का भविष्य तय किया जाता है. इंडिया गेट के सामने खड़े होकर आईसक्रीम खाना और हौज़ खास में जाकर माथा टेकना यहां के कई रिवाज़ों में से एक है.


बात खाने की करूं, तो कई जगह के गोलगप्पे ट्राई कर-कर के हार चुकी हूं पर आज तक वो 'परफ़ेक्ट स्वाद' नहीं मिला. गोलगप्पे भी अजीब हैं. एक तो महंगे ऊपर से स्वादहीन (विद नो ऑफ़ेंस टू दिल्ली के गोलगप्पे फ़ैन्स).  

मेट्रो में माओवाद पर किताब पढ़ने के लिए टिप्पणी मिलने से लेकर, सीट देने के लिए आशीर्वाद मिलने तक सब अनुभव हो चुका है. हल्की-फुल्की हरियाणवी भी समझ आने लगी है अब तो.


3 साल हो गए... इस शहर में एक कोना मेरा भी है पर अपना नहीं लगता. सुना है 7 राज्यों की राजधनी रह चुका है पर इसमें वो आत्मीयता नहीं मिलती, न ही यहां के आसमान को ताकते हुए वो सुकून मिलता है.  

उम्मीद है आने वाले समय में ये शहर मुझे अपना सा लगने लगे.