देश में आचार सहिंता लागू हो चुकी है, इसका एक मतलब ये भी है कि अब सभी राजनैतिक पार्टियां एक समान हो चुकी हैं किसी के पास सत्ता का लाभ नहीं है. यहां से एक वोटर के रूप में आपकी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है.

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वोट देने से पहले आपकी तैयारी भी पूरी होनी चाहिए, कुछ ज़रूरी बिंदु हैं जिनपर आपको अपने प्रत्याशी की जांच पड़ताल करना चाहिए.

1. लोकतंत्र के मूलधारणा को समझिए

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कई लोकतांत्रिक देश में ये चलन बढ़ गया है कि वो सीधे-सीधे प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार को देख कर वोट देते हैं. लेकिन ये एक ग़लत प्रथा है. आपका काम है अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि को चुने फिर सभी क्षेत्र के प्रतिनिधि में अपना नेता चुनेंगे, जो प्रधानमंत्री बनेगा.

सीधे प्रधानमंत्री को दिमाग़ में रख कर वोट देने से लोकतंत्र कमज़ोर होता है. आपके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि सीधे तौर पर आपके सवालों को संसद में उठाने के लिए जवाबदेह है और सीधे प्रधानमंत्री को चुनने से संसद की जवाबदेही कम हो जाती है. साथ ही साथ इससे लोकतंत्र में व्यक्तिवाद की धारणा मज़बूत होती है और धीरे-धीरे वो तानाशाही की शक़्ल अख़्तियार कर लेती है.

2. घोषणा पत्र

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ये स्वभाविक है कि राजनैतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए बढ़-चढ़ कर वादे कर देती हैं, उन्हें पांच साल के भीतर पूरा करना संभव नहीं रहता है. कोई पार्टी 60-70 प्रतिशत वादों को भी पूरा कर देती है, तो उसे बहुत अच्छा समझिए, ऐसे में ये आपका काम है कि उसके पिछले मेनिफ़िस्टों को उठा कर उनका मुल्यांकन कीजिए की कितना प्रतिशत काम हुआ है.

लेकिन ये तो सत्तापक्ष के लिए बात हुई, विपक्षी पार्टी ने आम जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को घेरा या नहीं, उनके सांसदों ने भी वाजिब सवालों को पटल पर रखा या नहीं ये भी देखना होगा. लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका पक्ष के बराबर ही होती है.

पिछले के अलावा वर्तमान घोषणा पत्र भी महत्वपूर्ण है, उस पर नज़र दौड़ाए बिना अपना बहुमुल्य वोट किसी को भी न दें. उससे पता चलेगा कि पार्टी की नज़र में कौनसे मुद्दे अहम हैं और वो किन्हें तर्ज़ीह देती है.

3. आदर्श उम्मीदवार

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उम्मीदवार का चयन, उसकी जाति, धर्म और हैसियत देख कर न करें. इससे आप देश को नुकसान तो करेंगे ही सीधे-सीधे अपना नुकसान भी करेंगे. आपका उम्मीदवार पढ़ा लिखा हो तो और भी बढ़िया बात है लेकिन अनपढ़ होना भी कोई जुर्म नहीं है. जनप्रतिनिधी का जनसेवक होना ज़रूरी है उसके लिए उच्च डिग्री की नहीं, उच्च आदर्शों की ज़रूरत पड़ती है.

उन उम्मीदवारों से दूरी बना लीजिए जो जाति, धर्म के आधार पर आपका वोट मांगता है. वो कभी आपका भला नहीं कर सकता. वो आपको जाति और धर्म के आधार पर बांटते रहेंगे, कमज़ोर बनाए रखेंगे और समाज में ज़हर घोलते रहेंगे.

4. वोट सबका अधिकार है

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कई घरों में देखा गया है कि परिवार के पुरुष ही ये तय कर देते हैं कि घर कि महिलाएं किसे वोट देंगी. हो सकता है पुरुषों को जो उम्मीदवार पसंद हो वो महिलाओं की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देता और महिला विरोधी हो, उसे वोट देने से महिलाओं का क्या भला होगा. उचित यही होगा को स्वतंत्र रूप से सूझ-बूझ से उन्हें अपने उम्मीदवार को चुनने दें और अपने विचार उनपर न थोपें.

5. वोट ज़रूर दें

वोट के दिन सरकारी छुट्टी होती है, प्राइवेट ऑफ़िस भी वोट के दिन बंद रहती है, कॉलेज भी बंद होते हैं. ये छुट्टी घर पर आराम करने के लिए नहीं मिलती है, इसका इस्तेमाल वोट देने के लिए करें अगर कोई बड़ी मज़बूरी न हो तभी वोट न देने को जायज़ माना जाएगा.

कोर्ट के आदेश के अनुसार वोट न देने का अधिकार भी आपके अधिकार क्षेत्र में ही आता है, लेकिन वोट न दे कर आप अपनी स्थिति को कमज़ोर करते हैं.

इस चुनावी पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लें और दूसरों को भी प्रेरित करें.

अगर आप 2019 के आम चुनाव में मतदान करने वाले हैं, तो आपका कर्तव्य बनता है कि अपने प्रत्याशी का चुनाव गंभीरता और सजगता से करें. क्योंकि ये आपके भविष्य, समाज के भविष्य और देश के भविष्य से जुड़ा मामला है.