प्यारे पापा,

हमारे समाज में 'मर्द' होने की एक परिभाषा बनी हुई है. मर्दानगी मतलब रोना नहीं, झुकना नहीं, सख़्त रहना होता है. एक ऐसा मर्द होना, जो हमेशा दूसरों के लिए सहारा बनता है न कि वो किसी का बनता है.

मगर पापा आप कभी भी इस तय परिभाषा या समाज द्वारा बने फ़ॉर्मूला के हिसाब से नहीं चले.

मुझे आज भी ध्यान है, जब डॉक्टर ने आपके जीभ के घाव के लिए कैंसर बताया था और Biopsy करवाने के लिए उन्होंने कहा था कि उनको आपका जीभ का एक हिस्सा काटना पड़ेगा. आपने मज़बूत बनने की कोशिश नहीं की बल्कि आप घर पर आते ही रोने लगे और गले लगाकर बताया कि मुझे डर लग रहा है. मुझे ये नहीं करवाना. मैंने देखा था कि आप कितने डरे हुए थे. आपको डर लगता है. इसलिए आप हमेशा मम्मी को कहते थे कि मैं नहीं देख सकता इसको ऐसे रोते हुए.

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इसलिए शायद जब भी मैं दोस्तों और लोगों के बीच मर्दों के कमज़ोर होने की बात करती थी तो वो कभी समझ नहीं पाते थे. शायद हमारे समाज में 'मर्द' बनना इंसान बनने से भी ज़्यादा जरूरी है. मैं कभी-कभी ये सोचती हूं कि आख़िर कहां से ये बात आई कि 'मर्द' रोते नहीं हैं. और ऐसा क्यों हैं कि सिर्फ़ एक औरत ही ख़ुल कर रोए और मर्द नहीं? शुक्र, है मेरे घर पर ऐसा कुछ नहीं है.

लड़के हमेशा ये बात मानने में ख़ुद को असहज महसूस करते हैं कि उनके जीवन में आस-पास की लड़कियों का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है. मगर आप कभी भी ऐसा एक भी मौका नहीं छोड़ते हैं, जब आप ये जता सकें कि मां उनके लिए क्या हैं. वो हमेशा बोलते हैं कि अगर मां नहीं होतीं उनका साथ देने के लिए तो वो ये सब कुछ भी नहीं कर पाते. वो हमेशा बोलते हैं कि तुम्हारी मां नहीं होती तो मैं इतना बड़ा व्यवसाय नहीं खड़ा कर पाता.

मां एक बार कंप्यूटर में आगे पढ़ना चाहती थीं तब आपने सबसे लड़ कर मां का साथ दिया था. और मां भी बहुत गर्व से सबसे बोलती हैं कि उनको लड़का बहुत अच्छा मिला है.

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पापा आप प्यार जताना भी कभी नहीं छोड़ते. वो मम्मी से बहुत रोमांटिक होकर बोलते हैं कि चलो आज तुमको लॉन्ग ड्राइव पर लेकर चलते हैं. यही नहीं घर पर ऐसे बहुत से पल होते हैं, जब पापा बातों-बातों में मां की तारीफ़ कर जाते हैं.

अच्छा जहां हम ये सुनते हैं कि मर्दों को किसी भी चीज़ से डर नहीं लगता वहीं मेरे पापा कीड़े-मकोड़ो से भी डरते हैं.

मेरे पापा हर मायने में समाज द्वारा बनाई गई मर्दों की छवि से अलग हैं और मुझे उनपर गर्व है.