विविधताओं का देश... भारत. बचपन से किताबों में पढ़ते आ रहे हैं कि अनेकता में एकता वाले इस देश में कई संस्कृतियां, धर्म सदियों से बसे हुए हैं.


इसी के साथ किसी भी संस्कृति, धर्म, क्षेत्र विशेष के लोगों के साथ कुछ स्टीरियोटाइप्स भी जुड़ गए हैं. जैसे हर बिहारी को भोजपुरी गाने पसंद होंगे या फिर हर बंगाली की आंखें बड़ी-बड़ी होंगी और उन्हें नृत्य और संगीत में महारत हासिल होगी ही.

मैं एक बंगाली हूं और क्योंकि मैं एक नॉन-रेसिडेंशियल बंगाली हूं तो बचपन से ही मेरा सामना कई संस्कृतियों के लोगों के साथ हुआ है.

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जब नौकरी के लिए दिल्ली शहर में कदम रखा, तो न तो प्रेज़ेंट की एलजेब्रा समझ आ रही थी और न ही फ़्यूचर की ट्रिगनोमेट्री. समझ लीजिए कतई हौच-पौच स्थिति थी और बस करियर में कुछ अच्छा करने के पीछे ही भागे जा रही थी.


बीतते वक़्त के साथ मुझे ये पता चला कि इस शहर में सिर्फ़ बिहार-यूपी या पंजाब-हरियाणा के लोग ही नहीं बसते (जैसा अमूमन सुनते आ रहे थे), यहां पहाड़ियों की भी अच्छी-ख़ासी आबादी है. मेरी समझ में यही था कि पहाड़ों पर रहने वालों को ही पहाड़ी बोलते हैं पर उत्तराखंड के लोगों की संगत में पता चला कि यहां भी दो क्षेत्र हैं, गढ़वाल और कुमाऊं. न सिर्फ़ एरिया बल्कि भाषा, खान-पान, तीज-त्यौहार भी अलग हैं.

स्कूल में बेड़ू पाको बारमासा गाया था और यही पता था कि ये पहाड़ी गाना है. इसके अतिरिक्त पहाड़ी संस्कृति के अलावा कुछ भी नहीं पता था. पर ये गाना मन में बस गया था और मतलब न पता होने के बावजूद अक़सर गुनगुनाया भी करती थी.

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एक दिन एक गढ़वाली सहकर्मी ने मुझे गुनगुनाते सुन लिया और पूछा, 'तुझे ये गाना कैसे पता?' मैंने बताया कि ये गाना बेहद पसंद है, बचपन में स्कूल में गाया था. इसके बाद उन्होंने कई गढ़वाली गाने भेजे.


'बेड़ू पाको बारमासा' के बाद मैंने 'चैता की चैत्वाल', 'फ्योंलड़ियां' और 'घुघुती बासुती' आदि भी सुने. इन गानों के मतलब आपको पहली बार में भले समझ न आएं, पर जो एहसास ये कान से होते हुए दिल में जगाते हैं, मुझे लगता है कि ये हर कोई फ़ील करेगा. ऐसा इसीलिए कह रही हूं कि 'चैता की चैत्वाल' पर मैंने अपने दोस्तों को भी नाचते देखा है.

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रिसर्च करके गढ़वाली-कुमाऊनी गीतकारों के बारे में पता चला और नरेंद्र सिंह नेगी से इंटरनेट ने परिचय करवाया. यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी कोई शख़्स हो सकता है, जो लाखों की दिल की बात कह पाए. पुरानी जेनेरशन ही नहीं, आज की जेनेरशन भी जिसके गाने उसी फ़ील के साथ गाए.

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दिल्ली आने के बाद, क़िस्मत मुझे गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों के पहाड़ों पर ले गई. मुझे इनमें कुछ अंतर समझ नहीं आया, हां ये ज़रूर कहूंगी कि दोनों में से कहीं भी घर बनाने का मन ज़रूर हो गया.


पहाड़ी सहकर्मियों के साथ रहकर ही पता चला कि बंगाली संस्कृति और पहाड़ी संस्कृति में कई समानताएं हैं. चाहे वो गानों से आने वाले फ़ील की बात की जाए, या फिर गुड़ से बनने वाली 'अरसा' मिठाई की या लौकी, मूली के पत्ते. मैं तो इसका दावा कर सकती हूं कि वो बड़ी सी नथ और 'काली घघरी' किसी भी स्त्री की ख़ूबसूरती बढ़ा सकती है.

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पहाड़ों पर सुकून के लिए जाने वालों के लिए यही कहूंगी कि अगली बार वहां की संस्कृति को करीब से देखने की कोशिश करें. रही मेरी बात तो मुझे गढ़वाली-कुमाऊंनी संस्कृति बेहद आकर्षित करती है.