रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा

डॉक्टर की डांट सुनकर तू भी Gym जाएगा

अजी बिल्कुल, 'शेम टू शेम' यही हुआ अपन के साथ भी. स्किन डॉक्टर से लेकर हड्डी के डॉक्टर तक ने 'लूज़ वेट अदरवाइज़...' वाला डायलॉग मार दिया. हमारे टाइम में डॉक्टर कोई भी हो, मिलेनीयल्स को 2 ही डॉयलॉग चिपकाते हैं- 
1) डोन्ट टेक स्ट्रेस
2)लूज़/गेन वेट 

मम्मी-पापा लोग जब हमारी उम्र के थे तो शायद उनको कुछ और बताया जाता हो. 

Source: Tenor

ख़ैर, बढ़ते Body Mass Index (BMI) और छोटे पड़ते कपड़ों ने मुझे भी वज़न कम करने का दृढ़ निश्चय लेने पर मजबूर कर दिया. जिस दिन दिल और दिमाग़ ने ट्वाइनिंग करके सेम बात बोली उसी दिन ऑफ़िस से जल्दी निकलर 'Gym Hunting' शुरू कर दिया. अरे भाई! 'पतलकार' हैं न, बिना थोड़ा रिसर्च किए काम नहीं बनता अपना.  

4-5 Gym में जाकर पता चला कि 'आसान नहीं यहां खुला-खुला Gym पाना'  

थक-हार के घर के पास आ गई और घर से 156 सेकेंड की दूरी पर ही एक Gym मिल गया. 

गेट पर पहुंची तो Gym वाला वहीं खड़ा था, मतलब फ़ुल टू शाहरूख़ ख़ान, जया बच्चन वाला पल. ख़ैर, 5% उम्मीद लेकर गई थी पर अंदर जाकर मानो दुनिया बदल गई. इतना खुला-खुला Gym... न पसीने की बदबू न ही धक्का-मुक्की का डर. मन तो बना ही लिया था कि यहीं आना है पर चट से हां नहीं करनी चाहिए इसलिए ट्रायल के लिए बात करके आई.  

अगले दिन ट्रायल पर गई. अब शुरू होने वाली थी शरीर की असली मज़दूरी. ट्रेनर ने नाम और काम-धाम पूछा ट्रे़डमील पर 5 मिनट के लिए तेज़-तेज़ चलने को कहा और ट्रेडमिल ऑन कर दिया और स्पीड वगैरह बढ़ाने-घटाने का प्रोसेस बताकर चला गया. जैसा की डर था 30 सेकेंड चली ही थी कि कुछ तो हुआ और धड़ाम...


जी हां Gym शुरू करने के 10 मिनट बाद ही बेइज़्ज़ती ख़राब कर ली. कोहनी में हल्की सी चोट भी आई. ख़ैर ट्रेनर और बाक़ी लोग शायद समझदार थे, कोई हंसा नहीं.  

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वॉकिंग के बाद आई साईक्लिंग की बारी. ट्रेनर ने 7 मिनट साईक्लिंग करने का निर्देश दिया. तो मैं तो पूरा 'आला आला मतवाला बर्फ़ी' फ़ील में साईक्लिंग करने लगी. सच बताऊं बचपन याद आ गया, ग्रैजुएशन के बाद अब जाकर साइकिल चला रही थी. हां ये अजीब लग रहा था कि कहीं पहुंच नहीं रही थी और ठंडी हवा भी महसूस नहीं हो रही थी. दिमाग़ में 'बर्फ़ी' गाना बज ही रहा था कि एक शख़्स ने आवाज़ लगाई, 'हेलो, फ़र्स्ट डे?' नज़रे घुमाईं तो देखा एक लड़की खड़ी मुस्कुरा रही है. उस वक़्त किसी से भी बात करने का मूड नहीं था, फिर भी मैं मुस्कुरा दी. इतने में मेरा ट्रेनर आ गया और कुछ ज़्यादा ही प्यार से उससे बातें करने लगा. मेरे दिमाग़ ने कहा, 'ओह... तब वो वीडियोज़ वाली बात सही होती है.' 

सोचते-सोचते साइकिल से उतरी ही थी कि एक बंदे की ज़ोर-ज़ोर आवाज़ें आने लगी, मानो शरीर की सारी एनर्जी निकल रही हो. हां तो वो जनाब डंबल उठा रहे थे. ट्रेनर ने एक दूसरी मशीन की तरफ़ इशारा करते हुए उसे चलाने को कहा. ये मशीन के साथ मेरी पहली मुलाक़ात थी, ट्रेनर ने उस पर भी 5 मिनट तक चलने को कहा. मज़ेदार मशीन थी. हाथ और पैर दोनों की कसरत होती थी.


मैं ख़ुश थी की वज़न ज़रूरत से ज़्यादा होने के बाद भी मैं हर टारगेट पूरा कर पा रही थी. ये सब सोच ही रही थी कि ट्रेनर ने आवाज़ लगाई स्ट्रेचिंग के लिए. हेड-रोलिंग, हैंड रोलिंग तक तो ठीक था पर लेग-रोलिंग करने की कोशिश शुरु ही की थी कि बैलेंस बिगड़ा और मैं लगभग गिर जाती अगर पास वाले ने बांह न पकड़ी होती.  

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मतलब इससे ज़्यादा बेइज़्ज़ती हो सकती है भला? पहला दिन और 1 नहीं 2 हरकतें? ख़ैर जैसे-तैसे सब ख़त्म हुआ और ट्रेनर ने घर जाने बोल दिया. 2 बार गिरकर अपनी बेइज़्ज़ती करवाने के बाद भी Gym से निकलते हुए मुझे अलग सी फ़्रेशनेस महसूस हो रही थी. घर जाकर मैंने पक्का वाला तय कर लिया कि खाने से प्यार थोड़ा कम करके वर्जिश से मोहब्बत करने की कोशिश करूंगी.


शरीर में दर्द तो हो रहा था पर अंदर से अच्छा महसूस हो रहा था. ऑफ़िस पहुंची और एक दोस्त ने सुट्टे के लिए पूछा और पता नहीं कैसे, मेरा मन नहीं किया. जबकि 1 दिन में 2-3 हो जाते थे. पूरे दिन सुट्टा पीने का मन नहीं किया. पूरा दिन अच्छा बीता. दोस्तों से मिलकर, घर पहुंची और खाना खाया. बिस्तर पर लेटकर अलार्म लगाया और कब सो गई पता ही नहीं चला.  

मेरी कोशिश रहेगी कि ज़िन्दगी में ये अच्छा बदलाव जारी रख सकूं.