4 अक्टूबर को देश की पहली प्राइवेट ट्रेन, दिल्ली-लखनऊ, तेजस एक्सप्रेस को लखनऊ से हरी झंडी दिखाई गई. IRCTC ने बताया कि इस ट्रेन के लेट होने पर यात्रियों को मुआवज़ा दिया जाएगा, 1 घंटे से अधिक लेट होने पर 100 रुपये और 2 घंटे से अधिक लेट होने पर 250 रुपये.


हम में तमीज़ तो है नहीं तो इस ट्रेन पर भी पहले दिन ही पत्थरबाज़ी भी हो गई.

ट्रेन में पूरी फ़्लाइट वाली फ़ील है. जैसे फ़्लाइट में अटेंडेंट होती है, वैसे ही इस ट्रेन में भी अटेंडेंट हैं.


एयर होस्टेस... शब्द सुनकर कई लोगों की आंखें चौड़ी हो जाती हैं क्योंकि ये नारियां कुछ ज़्यादा ही सुंदर होती हैं. एक मुस्कान के साथ चाय-कॉफ़ी सर्व करती हैं. अलग-अलग एयरलाइन की फ़्लाइट अटेंडेंट्स की यूनिफ़ॉर्म होती है, किसी की साड़ी, किसी की पैंट, तो किसी की ड्रेस.

तेजस के फ़्लाइट अटेंडेंट की पोशाक कुछ ऐसी है.

Source: Knock Sense

जैसा की हर छोटी-छोटी बातों पर लोगों की भौहें सिकुड़ जाती हैं, सोशल मीडिया साइट्स पर लोगों को इतनी बढ़िया सुविधा में भी नुक्स नज़र आने लगे.

इस ट्विटर यूज़र को अटेंडेंट के साड़ी न पहनने पर आपत्ति हो गई. वैसे तो देश में कई लोगों को 'लड़कियों' के अपनी मर्ज़ी से कपड़े पहनने पर आपत्ति है पर यहां लोगों ने हद की भी हद पार कर दी.

इस ट्वीट पर लोगों की कुछ प्रतिक्रिया भी पढ़ लीजिए-

ट्विटर सैनिकों को तेजस एक्सप्रेस के अटेंडेंट्स की यूनिफ़ॉर्म से संस्कृति को ख़तरा महसूस होने लगा. विडंबना तो ये थी कि वेस्टर्न कपड़ों में डीपी लगाकर लोग भारतीय संस्कृति को बचाने की दुहाई दे रहे थे. कुछ अच्छा होता नहीं कि ये तथाकथित संस्कृति के ठेकेदार जो शायद खु़द अपने निजी जीवन में मां-बहन की गाली देते हैं और किसी भी कपड़े में महिलाओं को घूरते होंगे सोशल मीडिया पर ज्ञान बांचते दिखते हैं.


मेरी समझ में इनमें से अधिकतर को धोती या साड़ी बांधनी तो दूर की बात ढंग से तह करनी भी नहीं आती होगी! जी हां, सामान्यीकरण किया है. पर सच बताइए कितने लोगों को आती होगी पापा लोगों की मदद के बिना तो पहनना मुश्किल ही है, हफ़्तेभर उसमें घूमना तो दूर की बात है!

संस्कृति किसी पहनावे की मोहताज नहीं है भाई, इतनी सिंपल सी बात कब समझोगे? किसी कपड़े के टुकड़े से संस्कृति पर असर पड़ता तो ये सार्वजिनक पूजा और त्यौहार कब के इतिहास बन चुके होते.

इस महिला को ट्विटर पर लोगों ने लताड़ भी लगाई-