महादेव की नगरी काशी. आप आस्तिक हों या नास्तिक इस शहर की दिव्यता आप दिल के तारों को छू ही लेगी. यहां की सुबह की चाय से लेकर शाम के 'नमो पार्वतये पते हर हर महादेव' तक में कुछ ऐसे एहसास हैं जिन्हें शब्दों में तौलना बेहद मुश्किल है.


ज़ाहिर है इस अजब से शहर का माहौल, संस्कृति सब बाक़ी शहरों से बिल्कुल अलग है. लोग कहते हैं 'नमो की काशी' पर मैं जानती हूं काशी किसी एक की नहीं. हर उस इंसान की है जिसने काशी की ओर बांहें फैलाई होंगी. अलग-अलग रीतियों की बात करें तो यहां मेरे लिए जो सबसे दिलचस्प रीति थी वो थी कि यहां शादी के बाद नवविवाहित जोड़े गंगा मैया का आशीर्वाद लेकर ही सुहागरात मनाते हैं. नवविवाहितों को गंगा पूजन करते मैंने कई बार देखा है. दूसरी ये कि यहां कोई 'प्रसाद' को मना नहीं करता. कई रीतियां हैं पर इन दोनों ने मुझे काफ़ी आकर्षित किया था.

Varanasi
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फ़ेसबुक पर अंगूठे को कष्ट दे रही थी कि एक दोस्त की शेयर की गई तस्वीर पर नज़र पड़ी.

महिलाओं ने दिया सास के शव को कंधा
Source: Navbharat Times

दोस्त ने कैप्शन में काशी का गुणगान किया था. ख़बर का कोई लिंक नहीं था तो मैं गूगल बाबा की शरण में पहुंची. वहां 2-3 बार सर्च करने के बाद नवभारत टाइम्स के लेख का लिंक मिला.


ख़बर ये थी कि वाराणसी के बरियासनपुर गांव में 80 वर्ष की रज्जी देवी की मृत्यु हो गई. उनकी बहुओं, परिवार की महिलाओं ने उनकी अर्थी को कंधा दिया और बड़ी बेटी ने मुखाग्नि दी. यही नहीं रिपोर्ट में ये भी लिखा था कि 13वीं के दिन वृक्षारोपण किया जाएगा.

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'हमारे यहां महिलाएं घुंघट में ही रहती हैं' वाले समाज में रज्जी देवी के घर की महिलाओं और बहुओं ने पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ने कि ओर एक क़दम बढ़ाया है.


इन महिलाओं ने वैसे देश में ये क़दम उठाया है जहां महिलाओं का शमशान जाना मना है. जब मैंने काशी के घाट पर ही एक अघोरी से ये सवाल किया था कि शमशान में महिलाओं का जाना किस शास्त्र में लिखा है, जवाब मिला था 'किसी शास्त्र में नहीं.' मैं ये तो नहीं जानती कि उस अघोरी ने सच कहा था या झूठ पर मुझे उनकी बात मानना ही सही लगा.

बहुओं द्वारा सास को कंधा देना दुखद और सुखद दोनों है. आमतौर पर हमारे देश में यही प्रचलित है कि सास और बहु में प्रेम नहीं होता. दोनों एक-दूसरे की आंखों की किरकिरी होती हैं. कई विज्ञापन और फ़िल्मों में भी यही दिखाया गया है. वहां रज्जी देवी की बहुओं ने ये काम करके सास-बहु के रिश्ते में नया अध्याय भी लिख दिया.


इस पूरी घटना की एक और बेहतरीन बात ये है कि गांव में किसी ने इस यात्रा को रोकने का प्रयास नहीं किया और सब ने इस निर्णय का समर्थन किया.

हम उस देश के वासी हैं जहां दलित की लाश को लटकाकर पुल से नीचे उतारा जाता है क्योंकि ऊंची जाति वालों को दलित की अंतिम यात्रा का रास्ता पंसद नहीं आता. वहां एक गांव की महिलाओं ने भविष्य के प्रति सकारात्मकता की जो मशाल जलाई है उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है. ये तस्वीर कड़ा तमाचा है उन लोगों के मुंह पर भी जिन्होंने महिलाओं पर अजीब-ओ-ग़रीब नियम-क़ानून लगा रखे हैं.