भारतीय क्रिकेट ने दुनिया को कई बेहतरीन कप्तान दिए हैं. पटौदी से लेकर गांगुली, धोनी से लेकर विराट का नाम क्रिकेट की हर क़िताब में लिखा हुआ है. लेकिन इसी भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने टीम को कुछ ऐसे कप्तान भी दिए, जिन्हें सिर्फ़ जगह भरने के लिए या पार्ट टाइम के लिए कप्तान बनाया गया. ऐसा नहीं है कि वो काबिल नहीं थे या नौसिखिये थे, बस, शायद गलत Era या किसी और बड़े खिलाड़ी के कप्तान बनने की वजह से कभी फुल-टाइम कप्तान नहीं बन पाए.

राहुल द्रविड़

'द वॉल' के नाम से प्रसिद्ध इस खिलाड़ी ने न जाने कितने मैच में भारत को जीत दिलवाई, लेकिन कप्तानी का वक़्त आते ही इन्हें दरकिनार कर दिया जाता. द्रविड़ के करियर के अंत में उन्हें कुछ समय के लिए कप्तानी का भार सौंपा गया था. इन्होंने अपनी कप्तानी में इंग्लैंड में 21 साल बाद भारत को सीरीज़ जीताई. कई बड़े खिलाड़ी मानते हैं कि द्रविड़ को कप्तानी पहले मिलनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

Rahul Dravid
Source: TOI

अनिल कुंबले

भारतीय टीम के शानदार गेंदबाज़ अनिल कुंबले के खेल पर किसी को संदेह नहीं था. लेकिन उन्हें भी बोर्ड ने कई बार अनदेखा किया. कप्तान के तौर पर कुंबले टीम में बहुत कम वक्‍त के लिए रहे, लेकिन ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी टीमों को अपनी कप्तानी में कुंबले ने धूल चटाई. शायद उस दौर में गांगुली के होने से कभी कप्तान की कमी खली नहीं. लेकिन कुंबले एक शानदार ऑपश्न ज़रूर थे.

Anil Kumble
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गुंडप्पा विश्वनाथ

बिशन सिंह बेदी के बाद भारत एक ऐसा कप्तान तलाश रहा था, जो 1983 वर्ल्ड कप में कप्तानी कर सके. कपिल से पहले सीनियर खिलाड़ी गुंडप्पा को इसकी बागडोर सौंपी गई, लेकिन अच्छे खेल के बावजूद उन्हें कप्तानी से हाथ धोना पड़ा.

Gundappa viswanath
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रवि शास्त्री

1986 के बाद भारत को भविष्य की टीम बनानी थी, जिसके लिए एक युवा कप्तान की तलाश की जा रही थी. ऐसे में नाम आया रवि शास्त्री का, जिन्हें मात्र एक मैच में कप्तानी का मौका मिला. जिसके बाद वो टीम की हिस्सा तो रहे, लेकिन कभी कप्तानी नहीं कर पाए.

Ravi Shashtri
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कृष्णमचारी श्रीकांत

रवि शास्त्री के बाद श्रीकांत को भी कप्तान के रूप में देखा गया और उन्हें भी कप्तानी का भार सौंपा गया. लेकिन एक साल में ही टीम की परफॉरमेंस इतनी गिरी की उन्हें भी कप्तानी से हाथ धोना पड़ा

Shreekant
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वीरेंद्र सहवाग

वीरेंद्र सहवाग को अनिल कुंबले से पहले कप्तान बनाया गया, लेकिन फिर उन्हें हटा कर कुंबले को लाया गया और वीरेंद्र सहवाग ने अलग-अलग हिस्सों में 4 बार कप्तानी की. अच्छी परफॉरमेंस के बावजूद उन्हें बस एक 'फ़िलर कप्तान' के तौर पर देखा गया. खुद वीरेंद्र सहवाग ने माना था कि उन्हें कप्तानी का मन था, लेकिन उन पर बोर्ड ने कभी ध्यान नहीं दिया.

Virendra Sehwag
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कप्तानी देने के बावजूद बीसीसीआई ने कभी इन खिलाड़ियों को कप्तान के रूप में सशक्त नहीं समझा. इनमें से ज़्यादातर खिलाड़ियों को शौहरत तो बहुत मिली, लेकिन शायद वक़्त और किस्मत दोनों ही इनके साथ नहीं थे. आंकड़े इन खिलाड़ियों के साथ रहे हैं, लेकिन एक नए कप्तान को खोज के कारण हमेशा इन्हें अनदेखा किया गया. अगर आपको ऐसे किसी और खिलाड़ी का नाम याद आए तो हमें ज़रूर कमेंट बॉक्स में लिख कर बताएं.