15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को पुरुष या महिला की बजाए एक तीसरे लिंग (Third Gender) का दर्जा दिया था. इससे किन्नर समुदाय के लोगों के सामाजिक विकास का रास्ता खुला था. भारत में लगभग 31 लाख किन्नर रहते हैं, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं. मगर आज से ही नहीं किन्नर समुदाय की अनदेखी ब्रिटिश राज से ही होती आ रही है.

जिन किन्नरों को हमारा समाज शुभ मानता है, किसी भी ख़ुशी के मौक़े पर उनका होना अच्छा माना जाता है, वहां किन्नरों के साथ आज़ादी से पहले बहुत ही बुरा बर्ताव किया जाता था.

चलिए कुछ तस्वीरों के ज़रिये ग़ुलाम भारत में किन्नरों की स्थिति से पर्दा उठाने की कोशिश करते हैं.  

1. अंग्रेज़ किन्नरों को समलैंगिक, भिखारी और अप्राकृतिक वेश्याएं कहते थे.

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2. किन्नरों को 1871 के विवादास्पद क़ानून(Criminal Tribes Act) के तहत आपराधिक समुदाय माना गया था. 

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3. औपनिवेशिक काल में किन्नरों को महिलाओं के कपड़े पहनने और सार्वजनिक तौर पर नाचने-गाने का काम करते पाए जाने पर ज़ुर्माना लगाया जाता था. 

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4. यही नहीं अगर कोई किन्नर महिला के कपड़े पहने दिख जाता तो अंग्रेज़ पुलिस उनके कपड़े उतरवा लेती या फिर उनके बाल तक काट देती थी. 

5. ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके साथ गाने-बजाने वाले बच्चों को भी उनसे अलग करना शुरू कर दिया था.

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6. अंग्रेज़ों के बढ़ते ज़ुल्म के दौरान 1870 में गाजीपुर के किन्नरों ने भूखे मरने की शिकायत भी दर्ज कराई थी. 

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7. उनपर अंग्रेज़ पुलिस अपहरण, बधियाकरण और धारा 377 के तहत मुक़दमा दर्ज कर उन्हें परेशान करती थी. 

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8. वास्तव में 1871 में जो क़ानून अंग्रेज़ों ने बनाया था उसकी आड़ में वो किन्नर समुदाय को ख़त्म करना चाहती थी. 

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9. अंग्रेज़ों को लगता था कि ये समुदाय ब्रिटिश राज सत्ता के लिए ख़तरा साबित हो सकता है. 

10. 1911 में CTA पार्ट 2 को अंग्रेज़ अफ़सर J. P. Hewett ने निरस्त कर दिया. क्योंकि उनका मानना था कि किन्नर अब मर रहे होंगे.

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11. मगर सच्चाई कुछ और ही थी. किन्नरों ने पुलिस से बचकर जीना सीख लिया था. वो छिप-छिपकर अपना काम भी कर रहे थे और इस तरह अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहे.

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सच में किन्नर समुदाय ने औपनिवेशिक काल में काफ़ी ज़ुल्म सहे थे.