Saadat Hasan Manto Quotes In Hindi : सआदत हसन मंटो इतिहास में दर्ज वो नाम है जिसने समाज की कड़वी सच्चाई को निडर होकर पन्नों पर उतारने का काम किया. उनकी लेखनी समाज का आईना थी, जिसे पढ़ कोई भी भौचक्का हो जाता था. वो समाज को उसी नज़र से देखते थे जैसा वो था. वो शायद पहले ऐसे लेखक होंगे, जिन्होंने समाज के उन अंधरे हिस्सों को छूने का काम किया, जिसके बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था. वो था वेश्याओं के जीवन व उनकी पीड़ा को दिखाने का का. अपनी बेबाकी के लिए मशहूर सआदत हसन मंटो के अफ़सानें उस समय के कई बुद्धिजीवियों को अश्लील लगे और यही वजह थी कि उनपर अश्लीलता के क़रीब छह मुकदमे चले, लेकिन वो डरे नहीं, अपने काम में आगे बढ़ते रहे.  


वो कहते थे कि, "अगर आपको मेरी कहानियां असहज लगती हैं, तो इसका कारण ये है कि हम असहज समय में जी रहे हैं."  

उनके जीवन के बारे में बात करें, तो उनका जन्म भारत पर अंग्रेज़ी हुकूमत के दौरान 11 मई 1912 को लुधियाना में हुआ था. हालांकि, विभाजन के दौरान उन्हें लौहोर जाना पड़ा, लेकिन वो बॉम्बे (मुंबई) में रहना चाहते थे. वहीं, वो हमेशा सफ़ेद कुर्ते-पज़ामे में ही दिखते थे, लेकिन सर्दियों के दौरान सूट भी पहन लिया करते थे. वो सिगरेट और शराब पीकर भी हैरान कर देने वाली कहानियां लिख दिया करते थे. वहीं, उनके द्वारा कह गए कथन आज भी समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं. आइये, पढ़ते हैं ऊर्दू के विवादित कहे जाने वाले लेखक सआदत हसन मंटो के कुछ जबरदस्त कोट्स.     

सआदत हसन मंटो के विचार - Saadat Hasan Manto Quotes In Hindi

1. मैं बग़ावत चाहता हूं. हर उस फ़र्द (व्यक्ति) के ख़िलाफ़ बग़ावत चाहता हूं जो हमसे मेहनत कराता है मगर उस के दाम अदा नहीं करता.  

2. हर औरत वेश्या नहीं होती, लेकिन हर वेश्या औरत होती है. इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए.  

3. आदमी या तो आदमी है वर्ना आदमी नहीं है, गधा है, मकान है, मेज़ है या और कोई चीज़ है.

4. मैं अदब और फ़िल्म को एक ऐसा मय-ख़ाना समझता हूं, जिसकी बोतलों पर कोई लेबल नहीं होता. 

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5. ये लोग जिन्हें उर्फ़-ए-आम में लीडर कहा जाता है, सियासत और मज़हब को लंगड़ा, लूला और ज़ख़्मी आदमी तसव्वुर करते हैं.

6. वेश्याओं के इशक़ में एक ख़ास बात काबिल-ए-ज़िक्र है. उनका इशक़ उनके रोज़मर्रा के मामूल (वह चीज़ जिसकी आशा हो) पर बहुत कम असर डालता है.

7. हिन्दुस्तान में सैकड़ों की तादाद में अख़्बारात-ओ-रसाइल छपते हैं, मगर हक़ीक़त ये है कि सहाफ़त (पत्रकारिता) इस सरज़मीन (मुल्क) में अभी तक पैदा ही नहीं हुई है.

8. हिन्दी के हक़ में हिंदू क्यों अपना वक़्त ज़ाया करते हैं. मुसलमान, उर्दू के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क्यों बेक़रार हैं? ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इन्सानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं.

9. जिस तरह जिस्मानी सेहत बरक़रार रखने के लिए कसरत की ज़रूरत है, ठीक उसी तरह ज़हन की सेहत बरक़रार रखने के लिए ज़हनी वरज़िश की ज़रूरत है.

10. मैं अफ़्साना (कहानी) इस लिए लिखता हूं कि मुझे अफ़्साना निगारी (लेखक का काम) की शराब की तरह लत पड़ गई है. मैं अफ़्साना ना लिखूं, तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने, या मैंने ग़ुसल नहीं किया या मैं ने शराब नहीं पी. 


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