साल था 1989. तारीख थी 20 नवंबर. समस्त विश्व के बच्चों के कल्याण के दृष्टिकोण से एक खास दिन. इस दिन एक ऐसा अध्याय लिखा जाना था, जिससे विश्व के सभी बच्चों की ज़िंदगी बदलने वाली थी. सभी बच्चे सुरक्षित होने वाले थे, उन्हें अधिकार मिलने वाले थे. ऐसा हुआ भी. 20 नवंबर 1989 को विश्व के सबसे बड़े संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘बाल अधिकार समझौते’ को पारित कर विश्व इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया, जिसमें बच्चों की तकदीर लिखी गई. मगर अफ़सोस वह तकदीर कागज़ से कभी बाहर नहीं निकल पाई.

दरअसल, बाल अधिकार संधि ऐसा पहला अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो सभी बच्चों को नागरिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की मान्यता देता है. इस समझौते पर संयुक्त राष्ट्र संघ के करीब 193 देशों ने हस्ताक्षर कर अपने देश में लागू करने का वायदा किया था, मगर दुख की बात है कि वह वायदा कभी हक़ीक़त नहीं बन पाया. इस बाल अधिकार समझौते पर साल 1992 में हमारे देश भारत ने भी हस्ताक्षर कर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी, मगर सरकार की ये प्रतिबद्धता सिर्फ़ कागज़ी प्रतिबद्धता निकली.

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आज भी आज़ाद भारत में अगर बच्चों की बात करें, तो हमारा देश काफी पीछे है. खासकर बच्चों के विकास को लेकर. लोग यह भूल रहे हैं कि हमारे देश का भविष्य हमारे बच्चों के हाथों में है. तो फिर सवाल है कि ये सब जानते हुए भी हम उसे अपने ही हाथों क्यों बरबाद होने दे रहे हैं? आज भी हमारे देश में बाल यौन शोषण, बाल तस्करी, भिक्षावृत्ति, ड्रग्स, और बालश्रम जैसी घटनाएं बच्चों के मासूम क़दमों को गहरी खाई की ओर धकेल रही हैं. सच कहूं तो आज बच्चे खुद अपने परिवार के बीच भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं.

साल 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 0 से 18 आयु समूह के 472 मिलियन बच्चे हैं, मगर एक सरकार और समाज के रूप में हम अभी भी बच्चों और उनके अधिकारों को लेकर गैर-जिम्मेदार और असंवेदनशील बने हुए हैं. पिछले कुछ सालों में भारत ने अभूतपूर्व तरक्की की है. कुछ साल पहले हमने मंगलयान की सफ़लता की खुशियां मनाई, लेकिन इस उजली तस्वीर पर कई दाग भी हैं. हमारा देश अभी भी भ्रूण हत्या, बाल व्यापार, यौन दुर्व्यवहार, लिंग अनुपात, बाल विवाह, बाल श्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा, कुपोषण जैसी समस्याओं से ग्रसित है. बीमारियों से मरने वाले बच्चों के हिसाब से दुनिया के कुछ सबसे बदतर देशों में शामिल है भारत. हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में अपने बच्चों को हिंसा, भेदभाव, उपेक्षा शोषण और तिरस्कार से निजात दिलाने में कामयाब नहीं हो सके हैं.

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संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार समझौते की बात करें, तो उसमें स्पष्ट रूप से बच्चा शब्द के साथ-साथ उनके अधिकारों को परिभाषित किया गया है. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक, 0 से 18 वर्ष की आयु का हर इंसान बच्चे की श्रेणी में आता है. बच्चों के सर्वांगिन विकास के लिए जो वांछनीय तत्व हैं, उन्हें प्रमुख तौर पर चार अधिकारों में बांटा गया है, जो निम्नलिखित हैं-

  • जीने का अधिकार (Rights of Survival)
  • सुरक्षा का अधिकार (Rights of Protection)
  • विकास का अधिकार (Rights of Development)
  • सहभागिता का अधिकार (Rights of Participation)

हालांकि, अपने देश में बच्चों के सारे अधिकार सुनिश्चित करने और उनकी समस्याओं के निदान के लिए कई स्तर पर आयोग भी गठित हैं, मगर अभी तक उन लक्ष्यों से हम काफ़ी दूर हैं, जिसका वादा हमने संयुक्त राष्ट्र संघ में हस्ताक्षर करने के वक़्त किया था.

भारत में बच्चों की स्थिति हर मामले में काफ़ी चिंताजनक है. साल 2016 में जारी की गई यूनिसेफ की रिपोर्ट की माने तो 2030 तक भारत सर्वाधिक बाल मृत्युदर वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल हो जाएगा और तब दुनिया भर में पांच साल तक के बच्चों की होने वाली कुल मौतों में 17 फीसदी बच्चे भारत के ही होंगें.

भले ही सरकार और गैर-सरकारी संगठन बच्चों के अधिकारों और उनके भविष्य को सुरक्षित करने के मुद्दे पर काम कर रहे हों या फिर कई योजनाएं चला रहे हों, लेकिन हक़ीक़त तो यही है कि जिस तेज़ी से बच्चों की स्थिति में सुधार होने चाहिए, वो देखने को नहीं मिलता.

हालांकि, इस मामले में गलती संयुक्त राष्ट्र संघ की भी है. इन मुद्दों पर वो अपनी संजीदगी नहीं दिखा रहा है. आज सिर्फ़ भारत में ही बच्चों की स्थिति दयनीय नहीं, बल्कि पूरे विश्व समुदाय की हालत खराब है. कमोवेश सभी देशों में बच्चों का जीवन खतरे में है. समय-समय पर बच्चों से संबंधित मुद्दे अख़बारों की सुर्खियां बनते हैं, तो सरकारें सक्रिय हो जाती हैं, मगर फिर कुछ दिन बात स्थिति वैसी ही देखने को मिलती है. आंकड़े दर्शाते हैं कि एक बड़ी संख्या में बच्चे अपराध और गै़र-काऩूनी जैसे घिनौने कामों के दलदल में धकेले जा रहे हैं.

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वैसे आपको तीन साल का वो सीरियाई बच्चा याद ही होगा, जो शरणार्थी संकट के साथ-साथ बच्चों की चिंता की तरफ़ दुनिया का ध्यान आकर्षित किया था. एलन कुर्दी ने विश्व समुदाय को बच्चों की चिंता करने पर मजबूर कर दिया था. मगर फिर हालात वैसे ही हो गये हैं. गाहे-बगाहे समय-समय पर ऐसी चीज़ें होती हैं और लोग समय के साथ भूलते भी चले जाते हैं.

मगर एक भारतीय होने के नाते मैं भारत और यहां के बच्चों की बात करूंगा. बच्चे हमारे समाज की नींव होते हैं. अगर वो नींव ही मजबूत न हो, तो फिर एक मजबूत और सशक्त भारत की कल्पना करना बेमानी होगा. सच कहूं, तो सुधार मुमकिन है, अगर सरकारों की प्राथमिकताओं में बच्चों और वंचितों के सवाल भी शामिल हो जाएं.

Feature image source: anujdiwakar